अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 342, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभावार्थसहित ॥ ११
कृषिकर्मचवाणिज्यं वैश्यवृत्तिरुदाहृता ॥ ६९ ॥
शूद्राणांद्विजशुश्रूषा परमोधर्मउच्यते ।
अन्यथाकुरुतेकिंचित्तद्भवेत्तस्यनिष्फलम् ॥ ७० ॥
लवणंमधुतैलंच दधितक्रंघृतंपयः ।
नदुष्येच्छूद्रजातीनां कुर्यात्सर्वेषुविक्रयम् ॥ ७१ ॥
विक्रीणन्मद्यमांसानि ह्यभक्ष्यस्यचभक्षणम् ।
कुर्वन्नगम्यागमनं शूद्रःपततितत्क्षणात् ॥ ७२ ॥
कपिलाक्षीरपानेन ब्राह्मणीगमनेनच ।
वेदाक्षरविचारेण शूद्रस्यनरकंध्रुवम् ॥ ७३ ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अतःपरंगृहस्थस्य धर्माचारंकलौयुगे ।
धर्मसाधारणंशक्यं चातुर्वर्ण्याश्रमागतम् ॥ १ ॥
संप्रवक्ष्याम्यहंपूर्वं पराशरवचोयथा ।
षट्कर्मसहितोविप्रः कृषिकर्माणिकारयेत् ॥२॥
रना व्यापार ये वैश्य की वृत्ति (जीविका) कही हैं ॥ ६९ ॥ और शूद्रों का परम धर्म द्विजों की सेवा करना कहा है । इस से भिन्न जो कुछ धर्मसम्बन्धी कृत्य शूद्र करता है वह उस का निष्फल है ॥ ७० ॥ लवण, सहत, तेल, दही, मठा, घी, और दूध ये शूद्रों के दूषित नहीं हैं इन को शूद्र सब जातियों में बेंचे ॥ ७१ ॥ मदिरा और मांस की बेचता, अभक्ष्य का भक्षण करता और गमन करने के अयोग्य ब्राह्मणी आदि स्त्री के संग गमन करके शूद्र उसी क्षण में पतित हो जाता है ॥ ७२ ॥ कपिला गौ का दूध पीने, ब्राह्मणी के संग गमन करने, और वेद के अक्षरों का विचार करने से शूद्र को निश्चय नरक होता है ॥ ७३ ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे १ अध्यायः ॥
इस के अनन्तर कलियुग में गृहस्थ का धर्म आचार और चारों वर्णों तथा आश्रमों का यथाशक्ति साधारण धर्म जो है ॥ १ ॥ उस को हम पहिले पराशर के वचनानुसार कहेंगे । छः कर्मों सहित ब्राह्मण खेती के काम भी करावे ॥२॥