अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ | पाराशरस्मृतिः ॥
न कश्चिद्वेदकर्त्ता च वेदस्मर्त्ता चतुर्मुखः ॥ २१ ॥
तथैव धर्मान्स्मरति मनुः कल्पान्तरान्तरे ।
अन्ये कृतयुगे धर्मा स्त्रेतायां द्वापरे परे ॥ २२ ॥
अन्ये कलियुगे नॄणां युगरूपाऽनुसारतः ।
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते ॥ २३
द्वापरे यज्ञमेवाहु र्दानमेकं कलौ युगे ।
कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः ॥ २४ ॥
द्वापरे शंखलिखिताः कलौ पाराशराः स्मृताः ।
त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत् ॥ २५ ॥
द्वापरे कुलमेकन्तु कर्त्तारं तु कलौ युगे ।
कृते संभाषणादेव त्रेतायां चैव दर्शनात् ॥ २६ ॥
द्वापरे त्वन्नमादाय कलौ पतति कर्मणा ।
कृते तात्क्षणिकः शापस्त्रेतायां दशभिर्दिनैः ॥ २७ ॥
हैं। परन्तु वेद का बनाने वाला कोई नहीं है (इसी से वेद अपौरुषेय कहाता है) किन्तु चतुर्मुख ब्रह्मा जी पूर्व कल्प के अभ्यास किये वेद का सर्गारम्भ में स्मरण करने वाले हैं ॥२१॥ उसी प्रकार मनु जी कल्प २ में तथा प्रत्येक मन्वन्तर में धर्मों का स्मरण करते हैं। सतयुग, त्रेता, और द्वापर में मनुष्यों का धर्म भिन्न २ हो जाता बदलता रहता है ॥२२॥ युग के अनुसार कलियुग में अन्य धर्म हो जाता है। सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, ॥२३॥ द्वापर में यज्ञ और कलियुग में एक दान को ही मुख्य कहते हैं (इसी बात को चाहे यों कहो वा मानो कि तप ज्ञान यज्ञ और दान ये धर्म के चार पग हैं उन में से सत्युगी तप को, त्रेतायुगी ज्ञान को, द्वापरयुगी यज्ञ को और कलियुगी धर्मात्मा दान को मुख्य कर्त्तव्य मानते हैं) सतयुग में मनु के कहे त्रेता में गौतम के कहे धर्म विशेष कर चल सकते हैं ॥२४॥ द्वापर में शंख और लिखित के तथा कलियुग में पराशर के कहे धर्म मानने उचित हैं। सतयुग में धर्महीन देश को और त्रेता में धर्मविरोधी ग्राम को ॥२५॥ द्वापर में धर्म विरोधी कुल को और कलियुग में अधर्म करने वाले को त्याग दो और सतयुग में अधर्मी के साथ संभाषण करने से, त्रेता में उस के देखने से ॥२६॥ द्वापर में अन्न लेकर और कलियुग में कर्म करने से पतित होता है। सतयुग में उसी समय और त्रेता में दशदिन में शाप लगता ॥२७॥