अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ १३
षड्गवंतंत्रियामाहेऽष्टभिःपूर्णतुवाहयेत् । नयातिनरकेष्वेवं वर्त्तमानस्तुवैद्विजः ॥१०॥ दानंदद्याच्चवैतेषां प्रशस्तंस्वर्गसाधनम् । संवत्सरेणयत्पापं मत्स्यघातीसमाप्नुयात् ॥११॥ अयोमुखेनकाष्ठेन तदेकाहेनलाङ्गली । पाशकोमत्स्यघातीच व्याधःशाकुनिकस्तथा ॥ १२ ॥ अदाताकर्षकश्चैव पञ्चैतेसमभागिनः । कण्डनीपेषणीचुल्ही उदकुम्भीचमार्जनी ॥ १३ ॥ पञ्चसूनागृहस्थस्य अहून्यहन्निवर्तते । वैश्वदेवोवलिर्भिक्षा गोग्रासोहन्तकारकः ॥ १४ ॥ गृहस्थःप्रत्यहंकुर्यात्सूनादोषैर्नलिप्यते । वृक्षान्छित्वामहींभित्त्वा हत्वाचकृमिकोटकान् ॥ १५ ॥ कर्षकःखलुयज्ञेन सर्वपापैःप्रमुच्यते ।
छः बैलों के हल को दिन के तीन पहर और आठ बैल के हल को सब दिन जोते ऐसे बर्तता हुआ द्विज नरक में नहीं जाता ॥१०॥ स्वर्ग का उत्तम साधन दान ब्राह्मणों को ही देवे। मच्छियों को मारने वाला एक वर्ष में जिस पाप का भागी होता है ॥११॥ लोहा है मुख में जिसके ऐसे काठ (हल) से हल वाला ब्राह्मण एक दिन में उस पापका भोगने वाला होता है । १-पाशक ( फांसी देके मारने वाला) २-मच्छियों का मारने वाला, ३-हरिणादि को मारने वाला बधिक ४-पक्षियों को पकड़ने वाला ॥ १२ ॥ तथा पांचवां जो दान न देवे और खेती करने वाला हो-ये पांचो एकही प्रकार के समान पाप भागी हैं। ओखली, चक्की, चूल्हा, जल के घड़े, मार्जनी (बुहारी) ॥१३॥ ये पांच हत्या गृहस्थ पुरुष को नित्य २ लगती हैं। वैश्वदेव (देवयज्ञ) बलि (भूतयज्ञ) भिक्षा देना, गोग्रास, और हंतकार नाम अतिथियज्ञ ॥ १४ ॥ इन पांचों को जो गृहस्थी प्रति दिन करता है वह पूर्वोक्त पांच हत्याओं के दोष से लिप्त नहीं होता। वृक्षों को काटने, पृथ्वी के खोदने, कृमि और कीड़ों के मारने से जो पाप खेती में लगता है ॥ १५ ॥ खेती करने वाला यज्ञ करने से उन सब पापों से