अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४ पाराशरस्मृतिः ॥
योनदद्याद्द्विजातिभ्यो राशिमूलमुपागतः ॥ १६ ॥
सचौरःसचपापिष्ठो ब्रह्मघ्नंतंविनिर्दिशेत् ।
राज्ञेदत्वातुषड्भागं देवानांचैकविंशकम् ॥ १७ ॥
विप्राणांत्रिंशकंभागं कृषिकर्त्तानलिप्यते ।
क्षत्रियोपिकृषिंकृत्वा देवान्विप्रांश्चपूजयेत् ॥ १८ ॥
वैश्यःशूद्रस्तथाकुर्यात्कृषिवाणिज्यशिल्पकम् ।
विकर्मकुर्वतेशुद्रा द्विजशुश्रूषयोज्झिताः ॥ १९ ॥
भवन्त्यल्पायुषस्तेवै निरयंयान्त्यसंशयम् ।
चतुर्णामपिवर्णाना मेषधर्मःसनातनः ॥ २० ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे द्वितीयोध्यायः ॥ २ ॥
अतःशुद्धिंप्रवक्ष्यामि जननेमरणेतथा ।
दिनत्रयेणशुद्ध्यन्ति ब्राह्मणाःप्रेतसूतके ॥ १ ॥
क्षत्रियोद्वादशाहेन वैश्यःपञ्चदशाहकैः ।
शूद्रःशुद्ध्यतिमासेन पराशरवचोयथा ॥ २ ॥
उपासनेतुविप्राणामङ्गशुद्धिर्भ्जायते ।
छूट जाता है । जिसके अन्न की राशि हुई हो और वह समीप में आये ब्रा-
ह्मणों को न दे तो ॥ १६ ॥ वह चौर और पापी है उसे ब्रह्महत्यारा कहते
हैं । छठा भाग राजा को और इक्कीसवां भाग देवताओं को ॥ १७ ॥ तीसवां
भाग ब्राह्मणों को जो देता है वह खेती के दोष से लिप्त नहीं होता । क्ष-
त्रिय भी खेती करे तो देवता और ब्राह्मणों की पूजा करे ॥ १८ ॥ तिसी प्र-
कार वैश्य और शूद्र भी खेती वाणिज्य ( व्यापार ) और कारीगरी—इनको
करें । द्विजों की सेवा को छोड़कर शूद्र लोग जो कर्म करते हैं वह खोटा काम
है ॥ १९ ॥ और वे शूद्र थोड़ी अवस्था वाले होते हैं और नरक में जाते हैं
इसमें संशय नहीं चारों वर्णों का यह सनातन धर्म है ॥ २० ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे २ अध्यायः ॥
अब जन्म और मरण समय में शुद्धि को कहते हैं । मरने के
सूतक में मध्यकोटि के धर्मनिष्ठ ब्राह्मण तीन दिन में शुद्ध होते हैं ॥ १ ॥
क्षत्रिय बारह दिन में वैश्य पन्द्रह दिन में शूद्र एक महीने में पाराशर के व-
चनानुसार शुद्ध होते हैं ॥ २ ॥ ब्राह्मणों की सेवा करने से सेवक का देह शुद्ध