अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 346, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभावार्थसहिता ॥ १५
ब्राह्मणानांप्रसूतौतु देहस्पर्शोविधीयते ॥ ३ ॥
जातेविप्रोदशाहेन द्वादशाहेनभूमिपः ।
वैश्यःपञ्चदशाहेन शूद्रोमासेनशुद्ध्यति ॥ ४ ॥
एकाहाच्छुद्ध्यतेविप्रो योऽग्निवेदसमन्वितः ।
त्र्यहात्केवलवेदस्तु द्विहीनोदशभिर्दिनैः ॥ ५ ॥
जन्मकर्मपरिभ्रष्टः संध्योपासनवर्जितः ।
नामधारकविप्रस्तु दशाहंसूतकीभवेत् ॥ ६ ॥
अजागावोमहिष्यश्च ब्राह्मणीनवसूतिका ।
दशरात्रेणसंशुद्ध्येद् भूमिस्थंचनवोदकम् ॥ ७ ॥
एकपिण्डास्तुदायादाः पृथग्दारनिकेतनाः ।
जन्मन्यपिविपत्तौच तेषांतत्सूतकंभवेत् ॥ ८ ॥
उभयत्रदशाहानि कुलस्यान्नं न भुञ्जते ।
दानंप्रतिग्रहोहोमः स्वाध्यायश्चनिवर्त्तते ॥ ९ ॥
हो जाता है। और जन्म सूतक में शूद्र को ब्राह्मण के देह का स्पर्श कहा है अर्थात् शूद्र के यहां होमादि से शुद्धि नहीं है । किन्तु शुद्धि के दिन पूरे हों तब स्नानादि करके ब्राह्मणों के चरणस्पर्श करके शूद्र शुद्ध होते हैं ॥ ३ ॥ जन्म सूतक में ब्राह्मण दशदिन में, क्षत्री बारह दिन में, वैश्य पन्द्रह दिन में, शूद्र एक महीने में शुद्ध होते हैं ॥ ४ ॥ अग्निहोत्र और वेदपाठ दोनों धर्म कृत्य यथोक्त करने वाला ब्राह्मण एक दिन में, केवल वेदपाठी तीन दिन में और जो इन दोनों से हीन हो वह ब्राह्मण दश दिन में शुद्ध होता है ॥ ५ ॥ द्वितीय जन्म से जातकर्मादि संस्कार तथा कर्म से हीन–और संध्योपासन जो न करता हो ऐसा जो नाम धारने वाला ब्राह्मण वह दश दिन के सूतक का भागी होता है ॥ ६॥ बकरी–गौ–भैंस–नवसूतिका (जिस के प्रथम ही सन्तान हुआ हो) ऐसी ब्राह्मणी और पृथ्वी पर ठहरा जल ये दश दिन में शुद्ध होते हैं ॥ ७ ॥ जो पिता के अंश के भागी हैं एक मा बाप से उत्पन्न हुए जिन के पृथक २ स्त्री और घर हैं जन्म और मरण का सूतक उन सब को होता है॥८॥ दोनों प्रकार के सूतकों में सूतक वालों का अन्न दश दिन तक नहीं खाना चाहिये । दान देना, दान लेना, ब्रह्मयज्ञ और होम भी सूतक में नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥