अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 332, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीगणेशायनमः ॥
अथ पाराशरस्मृतिप्रारम्भः
अथातोहिमशैलाग्रे देवदारुवनालये ।
व्यासमेकाग्रमासीनमपृच्छन्नृषयःपुरा ॥ १ ॥
मानुषाणां हितंधर्मं वर्तमानेकलौयुगे ।
शौचाचारंयथावच्च वदसत्यवतीसुत ! ॥ २ ॥
तच्छ्रुत्वाऋषिवाक्यंतु सशिष्योऽग्न्यर्कसन्निभः ।
प्रत्युवाचमहातेजाः श्रुतिस्मृतिविशारदः ॥ ३ ॥
नचाहंसर्वतत्वज्ञः कथंधर्मंवदाम्यहम् ।
अस्मत्पितैवप्रष्टव्य इतिव्यासःसुतोऽवदत् ॥ ४ ॥
ततस्तेऋषयःसर्वे धर्मतत्त्वार्थकाङ्क्षिणः ।
ऋषिंव्यासं पुरस्कृत्य गतावदरिकाश्रमम् ॥ ५ ॥
नानापुष्पलताकीर्णं फलपुष्पैरलङ्कृतम् ।
देवदारु वृक्षों के वन में हिमालय पर्वत के ऊपर एकाग्र बैठे हुए व्यास जी से पूर्वकाल में ऋषियों ने पूछा ॥ १ ॥ हे सत्यवती के पुत्र व्यासजी ! वर्तमान कलियुग में मनुष्यों का हितकारी धर्म शौच और आचार हमसे कहो ॥२॥
उक्त ऋषियों के वाक्य को सुनकर शिष्यों सहित अग्नि और सूर्य के तुल्य बड़े तेज वाले श्रुति और स्मृति में चतुर व्यासजी ऋषियों के प्रति बोले ॥ ३ ॥ कि हम सब तत्वों को नहीं जानते तब कैसे धर्म को कहें । हमारे पिता को ही यह विषय पूछौ यह पराशर के पुत्र व्यास ने कहा ॥४॥ तिसके अनन्तर धर्म के तत्त्व को चाहते हुए वे सब ऋषि लोग व्यास ऋषि को आगे लेकर बदरिकाश्रम ( बद्रीनारायण ) को गये ॥ ५ ॥ जो अनेक प्रकार के पुष्प लताओं