अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें७८ कात्यायनस्मृतिः ॥
प्रधानं हवनंचैव शेषंप्रकृतिवद्भवेत् ॥ १४ ॥
द्वीपमुन्नतमाख्यातं शादाचैवेष्टकास्मृता ।
कीलिनंसजलंरोक्तं दूरखातोदकोमरुः ॥ १५ ॥
द्वारंगवाक्षस्तम्भैः कर्द्दमभित्यन्तकोणवेधैश्च ।
नेष्टंवास्तुद्वारंविद्रुमनाक्रान्तिमार्थैश्च ॥ १६ ॥
वशंगमावितिव्रीहींउंछंवश्वेतियवांस्तथा ।
असावित्यत्रनामोक्त्वा जुहुयात्क्षिप्रहोमवत् ॥ १७ ॥
साक्षतं सुमनोयुक्तमुदकंदधिसंयुतम् ।
अर्घ्यंदधिमधुभ्यांच मधुपर्कोविधीयते ॥ १८ ॥
कांस्येनैवार्हणीयस्य निनयेदर्घ्यमञ्जलौ ।
कांस्यापिधानंकांस्यस्थं मधुपर्कं समर्पयेत् ॥ १९ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ एकोनत्रिंशत्तमः खण्डः ॥ २९ ॥
इति कात्यायनविरचिते कर्मप्रदीपे तृतीयः प्रपाठकः ॥
समाप्ता चेयं कात्यायनसंहिता ॥ शुभंभूयात् ॥
प्रधान कृत्य है किन्तु अन्य कोई प्रधान नहीं । प्रधान तथा होम शेष कर्म प्रकृति यज्ञ के समान होता है ॥ १४ ॥ ऊंचे को द्वीप कहते इष्टका ईंटो को शादा, जल सहित को कीलिन और जहां दूर खोदने से जल निकले उसे मरु (मारवाड़) कहते हैं ॥ १५ ॥ ऐसा घर का द्वार इष्ट (अच्छा) नहीं होता जिस में गवाक्ष (खिड़की) या झरोखे तथा खम्भ न हों और (कर्द्दम) गारा की भीत जिस में हो, कोण का जिस में वेध हों अथवा जिस में सज्जन नहीं हैं ॥ १६ ॥ (वशंगमौ०) इस मंत्र से व्रीहि और (शंलश्व) इस मंत्र से जौ का क्षिप्रहोम के समान होम करै परन्तु जो मंत्र में असौ पद है उसके स्थान में अपेक्षित का नाम बोले ॥ १७ ॥ अक्षत, फूल, दही, जिसमें मिलाये हों ऐसा जल अर्घ्य देने के लिये अर्घ्य कहाता है और दही तथा मधु जिसमें मिलाये हों उसे मधुपर्क कहते हैं ॥ १८ ॥ जिस अपने पूजने योग्य को अर्घ्य देना हो उसकी अंजली में कांसे के पात्र से अर्घ्य छोड़े और कांसे के पात्र से ढके हुए कांसे के पात्र में रखकर मधुपर्क का समर्पण करे ॥ १९ ॥
यह २९ उन्तीसवां खण्ड पूरा हुआ ॥
और कात्यायन ऋषि के रचे कर्म प्रदीप में तीसरा प्रपाठक पूरा हुआ ॥
इति कात्यायनस्मृतिः समाप्ता ॥