भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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श्रीगणेशायनमः । अथ बृहस्पतिस्मृतिप्रारम्भः ॥


इष्ट्वाक्रतुशतंराजा समाप्तवरदक्षिणम् ।
मघवावाग्विदांश्रेष्ठं पर्यपृच्छद्बृहस्पतिम् ॥ १ ॥
भगवन्केनदानेन सर्वतःसुखमेधते ।
यदत्तंयन्महार्घंच तन्मेब्रूहिमहत्तम? ॥ २ ॥
एवमिन्द्रेणपृष्टोऽसौ देवदेवपुरोहितः ।
वाचस्पतिर्महाप्राज्ञो बृहस्पतिरुवाचह ॥ ३ ॥
सुवर्णदानंगोदानं भूमिदानंचवासव? ।
एतत्प्रयच्छमानस्तु सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥ ४ ॥
सुवर्णंरजतंवस्त्रं मणिरत्नंचवासव? ।
सर्वमेवभवेद्दत्तं वसुधांयःप्रयच्छति ॥ ५ ॥
फालकृष्टांमहींदत्त्वा सबीजांसस्यशालिनीम् ।
यावत्सूर्यकरालोके तावत्स्वर्गंमहीयते ॥ ६ ॥


श्रेष्ठ दक्षिणा जिन में दी हो ऐसे सौ यज्ञों को समाप्त करके राजा इन्द्र ने विद्वानों में श्रेष्ठ बृहस्पति जी से पूछा ॥ १ ॥ कि हे भगवन् ! किस दान से मनुष्य को सब ओर से सुख बढ़ता है। और जो २ वस्तु दिया जाय और जो सर्वोपरि बहु मूल्य हो उस दान को हे बड़ों में बड़े मुझ से कहो ॥ २ ॥ इस प्रकार इन्द्र ने पूछा है जिनको ऐसे इन्द्र के पुरोहित और वाणी के पति और महान् विद्वान् बृहस्पति बोले कि ॥ ३ ॥ हे इन्द्र ! सुवर्ण, पृथ्वी, गौ, इन को जो देता है वह सब पापों से छूट जाता है ॥ ४ ॥ हे इन्द्र ? जो मनुष्य पृथिवी का दान देता है उसने सुवर्ण, चांदी, वस्त्र, मणि, रत्न, इन सबका दान दिया जानो ॥ ५ ॥ जो हल से जुती हो, जिसमें बीज बोया हो और जो हरे अन्न से शोभायमान हो, ऐसी पृथिवी को देनेवाला इतने काल तक स्वर्ग में वास करता है कि जब तक सूर्य का जगत् में प्रकाश है ॥ ६ ॥