अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२ बृहस्पतिस्मृतिः ॥
यत्किञ्चित्कुरुतेपापं पुरुषोवृत्तिकर्षितः ।
अपिगोचर्ममात्रेण भूमिदानेनशुद्ध्यति ॥ ७ ॥
दशहस्तेनदण्डेन त्रिंशद्दण्डानिवर्त्तनम् ।
दशतान्येवविस्तारो गोचर्मैतन्महाफलम् ॥ ८ ॥
सवृर्षंगोसहस्रन्तु यत्रतिष्ठत्यतन्द्रितम् ।
बालवत्साप्रसूतानां तद्गोचर्मेइतिस्मृतम् ॥ ९ ॥
विप्रायदद्याच्चगुणान्विताय तपोनियुक्तायजितेन्द्रियाय।
यावन्महीतिष्ठतिसागरान्ता तावत्फलंतस्यभवेदनन्तम् ॥१०॥
यथाबीजानिरोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले ।
एवंकामाः प्ररोहन्ति भूमिदानसमर्जिताः ॥ ११ ॥
यथाप्सुपतितःसद्यस्तैलविन्दुःप्रसर्पति ।
एवंभूमिकृतंदानं सस्येसस्येप्ररोहति ॥ १२ ॥
अन्नदाःसुखिनोनित्यं वस्त्रदश्चैवरूपवान् ।
सनरस्सर्वदोभूप? योददातिवसुन्धराम् ॥ १३ ॥
आजीविका से दुःखी मनुष्य जो कुछ पाप करता है, वह गौ के चर्म की बरा-बर पृथिवी का दान देकर शुद्ध होजाता है ॥ ७ ॥ दश हाथ के दण्ड से तीस-दण्ड भर जिस की लम्बाई और चौड़ाई हो यह महान् फल का देने वाला गोचर्म का नाप कहाता है ॥ ८ ॥ जितने भूभाग में हजार गौ और हजार बैल आनन्द से ठहर सकें तथा उन गौओं में जो ब्यानी हों उन के बाल बछड़े भी जिस में आसकें उसे गोचर्म प्रमाण कहते हैं ॥ ९ ॥ जो इस पृथ्वी को ऐसे ब्राह्मण को देवे जो गुणी हो, तपस्वी हो, जितेन्द्रिय हो, उस पुरुष को, समुद्र पर्यन्त पृथ्वी जब तक रहेगी तब तक अनन्त फल होता है ॥ १० ॥ जैसे पृथ्वी पर बोये हुए बीज जमते हैं वैसे ही पृथ्वी के दान से कामनाओं की सिद्धियां बढ़ती हैं ॥११॥ हे इन्द्र ! जैसे जल में पड़ी तेल की बूंद फैलती है ऐसे ही किया हुआ भूमि का दान शस्य २ में जमता है ॥ १२ ॥ अन्न का दाता सदा सुखी, वस्त्र का दाता सुन्दर रूपवाला होता है और हे राजन् ! वह मनुष्य सब कुछ देने वाला होता है जो पृथ्वी को देता है ॥ १३ ॥