अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 322, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाथंसहिता ॥ ३
यथागौर्भरतेवत्सं क्षीरमुत्सृज्यक्षीरिणी ।
स्वयंदत्तासहस्राक्ष ? भूमिर्भरतिभूमिदम् ॥ १४ ॥
शंखम्भद्रासनंछत्रं चरस्थावरवारणाः ।
भूमिदानस्यपुण्यानि फलंस्वर्गःपुरन्दर ! ॥ १५ ॥
आदित्योवरुणोवन्हिर्ब्रह्मासोमोहुताशनः ।
शूलपाणिश्चभगवानभिनन्दतिभूमिदम् ॥ १६ ॥
आस्फोटयन्तिपितरः प्रहर्षन्तिपितामहाः ।
भूमिदाताकुलेजातः सचत्राताभविष्यति ॥ १७ ॥
त्रीण्याहुरतिदानानि गावःपृथ्वोसरस्वती ।
तारयन्तीहदातारं सर्वपापादसंशयम् ॥ १८ ॥
प्रावृतावस्त्रदायान्ति नग्नायान्तित्ववस्त्रदाः ।
तृप्तायान्त्यन्नदातारः क्षुधितायान्त्यनन्नदाः ॥ १६ ॥
काङ्क्षन्तिपितरःसर्वे नरकाद्भयभीरवः ।
जैसे दूध देती गौ दूध को छोड़कर बछड़े को संतुष्ट करती है हे इन्द्र ! ऐसे ही अपने हाथ से दी हुई पृथ्वी भी अपने दाता को पुष्ट सन्तुष्ट करती है ॥ १४ ॥ शंख, भद्रासन, ( राजगद्दी ) छाता, चर प्राणी, स्थावर वृक्षादि, उत्तम हाथी हे इन्द्र ! ये पृथ्वी के दान के पुण्य हैं और स्वर्ग फल है ॥ १५ ॥ सूर्य-वरुण, अग्नि, ब्रह्मा, चन्द्रमा, होम का अग्नि-और भगवान शिवजी ये पृथ्वी के दाता की प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥
पृथिवी दाता के पितृ पितामह लोग अच्छे प्रकार आनन्द मनाते हैं कि हमारे कुल में पृथिवी दाता सन्तान जन्मा है वही हमारी रक्षा करने वाला होगा ॥ १७ ॥ गौ, पृथिवी और विद्या ये तीन सब से बड़े तथा श्रेष्ठ महादान हैं, ये तीनों दाता को निःसन्देह पापों से पार कर देते हैं ॥ १८ ॥ वस्त्र के दाता ढके हुये सुरक्षित, जिन्होंने वस्त्र नहीं दिये वे नंगे, अन्न के दाता तृप्त हुये और जिन्हों ने अन्न नहीं दिया वे भूखे जाया करते हैं ॥१९॥ नरक के भय से डरते हुये पितर यह इच्छा करते हैं कि जो पुत्र गया में जायगा