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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

७८ कात्यायनस्मृतिः ॥

प्रधानं हवनंचैव शेषंप्रकृतिवद्भवेत् ॥ १४ ॥
द्वीपमुन्नतमाख्यातं शादाचैवेष्टकास्मृता ।
कीलिनंसजलंरोक्तं दूरखातोदकोमरुः ॥ १५ ॥
द्वारंगवाक्षस्तम्भैः कर्द्दमभित्यन्तकोणवेधैश्च ।
नेष्टंवास्तुद्वारंविद्रुमनाक्रान्तिमार्थैश्च ॥ १६ ॥
वशंगमावितिव्रीहींउंछंवश्वेतियवांस्तथा ।
असावित्यत्रनामोक्त्वा जुहुयात्क्षिप्रहोमवत् ॥ १७ ॥
साक्षतं सुमनोयुक्तमुदकंदधिसंयुतम् ।
अर्घ्यंदधिमधुभ्यांच मधुपर्कोविधीयते ॥ १८ ॥
कांस्येनैवार्हणीयस्य निनयेदर्घ्यमञ्जलौ ।
कांस्यापिधानंकांस्यस्थं मधुपर्कं समर्पयेत् ॥ १९ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ एकोनत्रिंशत्तमः खण्डः ॥ २९ ॥
इति कात्यायनविरचिते कर्मप्रदीपे तृतीयः प्रपाठकः ॥
समाप्ता चेयं कात्यायनसंहिता ॥ शुभंभूयात् ॥


प्रधान कृत्य है किन्तु अन्य कोई प्रधान नहीं । प्रधान तथा होम शेष कर्म प्रकृति यज्ञ के समान होता है ॥ १४ ॥ ऊंचे को द्वीप कहते इष्टका ईंटो को शादा, जल सहित को कीलिन और जहां दूर खोदने से जल निकले उसे मरु (मारवाड़) कहते हैं ॥ १५ ॥ ऐसा घर का द्वार इष्ट (अच्छा) नहीं होता जिस में गवाक्ष (खिड़की) या झरोखे तथा खम्भ न हों और (कर्द्दम) गारा की भीत जिस में हो, कोण का जिस में वेध हों अथवा जिस में सज्जन नहीं हैं ॥ १६ ॥ (वशंगमौ०) इस मंत्र से व्रीहि और (शंलश्व) इस मंत्र से जौ का क्षिप्रहोम के समान होम करै परन्तु जो मंत्र में असौ पद है उसके स्थान में अपेक्षित का नाम बोले ॥ १७ ॥ अक्षत, फूल, दही, जिसमें मिलाये हों ऐसा जल अर्घ्य देने के लिये अर्घ्य कहाता है और दही तथा मधु जिसमें मिलाये हों उसे मधुपर्क कहते हैं ॥ १८ ॥ जिस अपने पूजने योग्य को अर्घ्य देना हो उसकी अंजली में कांसे के पात्र से अर्घ्य छोड़े और कांसे के पात्र से ढके हुए कांसे के पात्र में रखकर मधुपर्क का समर्पण करे ॥ १९ ॥

यह २९ उन्तीसवां खण्ड पूरा हुआ ॥
और कात्यायन ऋषि के रचे कर्म प्रदीप में तीसरा प्रपाठक पूरा हुआ ॥
इति कात्यायनस्मृतिः समाप्ता ॥

श्रीगणेशायनमः । अथ बृहस्पतिस्मृतिप्रारम्भः ॥


इष्ट्वाक्रतुशतंराजा समाप्तवरदक्षिणम् ।
मघवावाग्विदांश्रेष्ठं पर्यपृच्छद्बृहस्पतिम् ॥ १ ॥
भगवन्केनदानेन सर्वतःसुखमेधते ।
यदत्तंयन्महार्घंच तन्मेब्रूहिमहत्तम? ॥ २ ॥
एवमिन्द्रेणपृष्टोऽसौ देवदेवपुरोहितः ।
वाचस्पतिर्महाप्राज्ञो बृहस्पतिरुवाचह ॥ ३ ॥
सुवर्णदानंगोदानं भूमिदानंचवासव? ।
एतत्प्रयच्छमानस्तु सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥ ४ ॥
सुवर्णंरजतंवस्त्रं मणिरत्नंचवासव? ।
सर्वमेवभवेद्दत्तं वसुधांयःप्रयच्छति ॥ ५ ॥
फालकृष्टांमहींदत्त्वा सबीजांसस्यशालिनीम् ।
यावत्सूर्यकरालोके तावत्स्वर्गंमहीयते ॥ ६ ॥


श्रेष्ठ दक्षिणा जिन में दी हो ऐसे सौ यज्ञों को समाप्त करके राजा इन्द्र ने विद्वानों में श्रेष्ठ बृहस्पति जी से पूछा ॥ १ ॥ कि हे भगवन् ! किस दान से मनुष्य को सब ओर से सुख बढ़ता है। और जो २ वस्तु दिया जाय और जो सर्वोपरि बहु मूल्य हो उस दान को हे बड़ों में बड़े मुझ से कहो ॥ २ ॥ इस प्रकार इन्द्र ने पूछा है जिनको ऐसे इन्द्र के पुरोहित और वाणी के पति और महान् विद्वान् बृहस्पति बोले कि ॥ ३ ॥ हे इन्द्र ! सुवर्ण, पृथ्वी, गौ, इन को जो देता है वह सब पापों से छूट जाता है ॥ ४ ॥ हे इन्द्र ? जो मनुष्य पृथिवी का दान देता है उसने सुवर्ण, चांदी, वस्त्र, मणि, रत्न, इन सबका दान दिया जानो ॥ ५ ॥ जो हल से जुती हो, जिसमें बीज बोया हो और जो हरे अन्न से शोभायमान हो, ऐसी पृथिवी को देनेवाला इतने काल तक स्वर्ग में वास करता है कि जब तक सूर्य का जगत् में प्रकाश है ॥ ६ ॥

२ बृहस्पतिस्मृतिः ॥

यत्किञ्चित्कुरुतेपापं पुरुषोवृत्तिकर्षितः ।
अपिगोचर्ममात्रेण भूमिदानेनशुद्ध्यति ॥ ७ ॥
दशहस्तेनदण्डेन त्रिंशद्दण्डानिवर्त्तनम् ।
दशतान्येवविस्तारो गोचर्मैतन्महाफलम् ॥ ८ ॥
सवृर्षंगोसहस्रन्तु यत्रतिष्ठत्यतन्द्रितम् ।
बालवत्साप्रसूतानां तद्गोचर्मेइतिस्मृतम् ॥ ९ ॥
विप्रायदद्याच्चगुणान्विताय तपोनियुक्तायजितेन्द्रियाय।
यावन्महीतिष्ठतिसागरान्ता तावत्फलंतस्यभवेदनन्तम् ॥१०॥
यथाबीजानिरोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले ।
एवंकामाः प्ररोहन्ति भूमिदानसमर्जिताः ॥ ११ ॥
यथाप्सुपतितःसद्यस्तैलविन्दुःप्रसर्पति ।
एवंभूमिकृतंदानं सस्येसस्येप्ररोहति ॥ १२ ॥
अन्नदाःसुखिनोनित्यं वस्त्रदश्चैवरूपवान् ।
सनरस्सर्वदोभूप? योददातिवसुन्धराम् ॥ १३ ॥


आजीविका से दुःखी मनुष्य जो कुछ पाप करता है, वह गौ के चर्म की बरा-बर पृथिवी का दान देकर शुद्ध होजाता है ॥ ७ ॥ दश हाथ के दण्ड से तीस-दण्ड भर जिस की लम्बाई और चौड़ाई हो यह महान् फल का देने वाला गोचर्म का नाप कहाता है ॥ ८ ॥ जितने भूभाग में हजार गौ और हजार बैल आनन्द से ठहर सकें तथा उन गौओं में जो ब्यानी हों उन के बाल बछड़े भी जिस में आसकें उसे गोचर्म प्रमाण कहते हैं ॥ ९ ॥ जो इस पृथ्वी को ऐसे ब्राह्मण को देवे जो गुणी हो, तपस्वी हो, जितेन्द्रिय हो, उस पुरुष को, समुद्र पर्यन्त पृथ्वी जब तक रहेगी तब तक अनन्त फल होता है ॥ १० ॥ जैसे पृथ्वी पर बोये हुए बीज जमते हैं वैसे ही पृथ्वी के दान से कामनाओं की सिद्धियां बढ़ती हैं ॥११॥ हे इन्द्र ! जैसे जल में पड़ी तेल की बूंद फैलती है ऐसे ही किया हुआ भूमि का दान शस्य २ में जमता है ॥ १२ ॥ अन्न का दाता सदा सुखी, वस्त्र का दाता सुन्दर रूपवाला होता है और हे राजन् ! वह मनुष्य सब कुछ देने वाला होता है जो पृथ्वी को देता है ॥ १३ ॥

भाषाथंसहिता ॥ ३

यथागौर्भरतेवत्सं क्षीरमुत्सृज्यक्षीरिणी ।
स्वयंदत्तासहस्राक्ष ? भूमिर्भरतिभूमिदम् ॥ १४ ॥

शंखम्भद्रासनंछत्रं चरस्थावरवारणाः ।
भूमिदानस्यपुण्यानि फलंस्वर्गःपुरन्दर ! ॥ १५ ॥

आदित्योवरुणोवन्हिर्ब्रह्मासोमोहुताशनः ।
शूलपाणिश्चभगवानभिनन्दतिभूमिदम् ॥ १६ ॥

आस्फोटयन्तिपितरः प्रहर्षन्तिपितामहाः ।
भूमिदाताकुलेजातः सचत्राताभविष्यति ॥ १७ ॥

त्रीण्याहुरतिदानानि गावःपृथ्वोसरस्वती ।
तारयन्तीहदातारं सर्वपापादसंशयम् ॥ १८ ॥

प्रावृतावस्त्रदायान्ति नग्नायान्तित्ववस्त्रदाः ।
तृप्तायान्त्यन्नदातारः क्षुधितायान्त्यनन्नदाः ॥ १६ ॥

काङ्क्षन्तिपितरःसर्वे नरकाद्भयभीरवः ।


जैसे दूध देती गौ दूध को छोड़कर बछड़े को संतुष्ट करती है हे इन्द्र ! ऐसे ही अपने हाथ से दी हुई पृथ्वी भी अपने दाता को पुष्ट सन्तुष्ट करती है ॥ १४ ॥ शंख, भद्रासन, ( राजगद्दी ) छाता, चर प्राणी, स्थावर वृक्षादि, उत्तम हाथी हे इन्द्र ! ये पृथ्वी के दान के पुण्य हैं और स्वर्ग फल है ॥ १५ ॥ सूर्य-वरुण, अग्नि, ब्रह्मा, चन्द्रमा, होम का अग्नि-और भगवान शिवजी ये पृथ्वी के दाता की प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥

पृथिवी दाता के पितृ पितामह लोग अच्छे प्रकार आनन्द मनाते हैं कि हमारे कुल में पृथिवी दाता सन्तान जन्मा है वही हमारी रक्षा करने वाला होगा ॥ १७ ॥ गौ, पृथिवी और विद्या ये तीन सब से बड़े तथा श्रेष्ठ महादान हैं, ये तीनों दाता को निःसन्देह पापों से पार कर देते हैं ॥ १८ ॥ वस्त्र के दाता ढके हुये सुरक्षित, जिन्होंने वस्त्र नहीं दिये वे नंगे, अन्न के दाता तृप्त हुये और जिन्हों ने अन्न नहीं दिया वे भूखे जाया करते हैं ॥१९॥ नरक के भय से डरते हुये पितर यह इच्छा करते हैं कि जो पुत्र गया में जायगा

४ | बृहस्पतिस्मृतिः ॥

गयांयास्यतियःपुत्रः सनस्त्राताभविष्यति ॥ २० ॥
एष्टव्याबहवःपुत्रा यद्येकोपिगयांब्रजेत् ।
यजेतवाश्वमेधेन नीलंवावृषमुत्सृजेत् ॥ २१ ॥
लोहितोयस्तुवर्णेन पुच्छाग्रे यस्तुपाण्डुरः ।
श्वेतःखुरविषाणाभ्यां सनीलोवृषउच्यते ॥ २२ ॥
नीलःपाण्डुरलाङ्गूलस्तृणमुद्धरतेतुयः ।
षष्टिवर्षसहस्राणि पितरस्तेनतर्पिताः ॥ २३ ॥
यस्यशृङ्गगतंपङ्कं कूलात्तिष्ठतिचोद्धृतम् ।
पितरस्तस्यचाश्नन्ति सोमलोकंमहाद्युतिम् ॥ २४ ॥
पृथोर्यदोर्दिलीपस्य नृगस्यनहुषस्यच ।
अन्येषांचनरेन्द्राणां पुनरन्योभविष्यति ॥ २५ ॥
बहुभिर्वसुधादत्ता राजभिःसगरादिभिः ।
यस्ययस्ययदाभूमिस्तस्यतस्यतथाफलम् ॥ २६ ॥
यस्तु ब्रह्मघ्नःस्त्रीघ्नोवा यस्तुवैपितृघातकः ।


वही हमारी रक्षा करने वाला होगा ॥ २० ॥ मनुष्य बहुत से पुत्रों की इच्छा करे यदि उन में से एक भी गया को जाय व अश्वमेध यज्ञ करे वा नील बैल का वृषोत्सर्ग करे ॥२१॥ नील बैल उस को कहते हैं जिस का रंग लाल हो, जो पूंछ के अग्रभाग में पीला हो और खुर तथा सींग जिस के सफेद हों ॥२२॥ नील जिसका रंग हो, पीली जिस की पूंछ हो और जो घास तृणों को उखाड़ २ के चरे, ऐसे बैल के उत्सर्ग से साठ हजार वर्ष तक पितर तृप्त होते हैं ॥ २३ ॥ नदी आदि के किनारे से उखाड़ा हुआ पंक ( कीचड़ ) जिस के सींग पर लगा हो ऐसे बैल के उत्सर्ग कर्त्ता के पितर प्रकाशमान चन्द्रमा के लोक को भोगते हैं ॥ २४ ॥ राजा पृथु, यदु, दिलीप, नृग, नहुष, और अन्य राजाओं में से कोई राजा वह वृषोत्सर्ग करने वाला मेरे पीछे फिर होता है ॥ २५ ॥ बहुत से सगर आदि राजाओं ने पृथिवी का दान किया जिस २ की जैसी २ पृथिवी दान हुई उस २ को वैसा २ ही फल हुआ ॥ २६ ॥ जो पुरुष ब्रह्म हत्यारा वा स्त्री को मारने वाला और पितृ घातक है वह पापी

भावार्थसहिता ॥ ५

गवांशतसहस्राणां हन्ताभवतिदुष्कृती ॥ २७ ॥
स्वदत्तांपरदत्तांवा योहरेतवसुन्धराम् ।
श्वविष्ठायांक्रमिर्भूत्वा पितृभिःसहपच्यते ॥ २८ ॥
आक्षेप्ताचानुमन्ताच तमेवनरकंव्रजेत् ।
भूमिदोभूमिहर्ताच नापरंपुण्यपापयोः ॥ २९ ॥
ऊर्ध्वंचाधोवतिष्ठेत यावदाभूतसंप्लवम् ।
अग्नेरपत्यंप्रथमंसुवर्णं भूर्वैष्णवीसूर्यसुताश्चगावः ॥३०॥
लोकास्त्रयस्तेनभवन्तिदत्ता यःकाञ्चनंगांचमहींचदद्यात् ।
षडशीतिसहस्राणां योजनानांवसुन्धरा ॥ ३१ ॥
स्वयंदत्तातुसर्वत्र सर्वकामप्रदायिनी ।
भूमिंयःप्रतिगृह्णाति भूमिंयश्चप्रयच्छति ॥ ३२ ॥
उभौतौपुण्यकर्माणौ नियतंस्वर्गगामिनौ ।
सर्वेषामेवदानानामेकजन्मानुगंफलम् ॥ ३३ ॥
हाटकक्षितिगौरीणां सप्तजन्मानुगंफलम् ।


लक्ष गौओं को मारने वाला होता है ॥२७॥ जो पुरुष अपनी या पराई दी हुई पृथ्वी को छीन लेता है वह कुत्ते की विष्ठा में कीड़ा होकर पितरों सहित पकाया जाता है ॥ २८ ॥ आक्षेप करने और अनुमति देने वाला एक ही नरक में जाते हैं । पृथ्वी का दाता और पृथ्वी का हरने वाला अपने २ पुण्य वा पाप से ॥ २९ ॥ क्रम से स्वर्ग में वा नरक में प्रलय पर्यन्त ठहरते हैं। अग्नि का प्रथम पुत्र सुवर्ण है, पृथ्वी विष्णु की पत्नी है और सूर्य की पुत्री गौ है॥३०॥जो पुरुष सुवर्ण गौ और पृथ्वी को दान में देता है उस ने मानो तीनों लोक दिये। छ्यासी हजार योजन पृथिवी का विस्तार है ॥३१॥ उस को जिस ने स्वयं दिया है वह पृथ्वी उसकी सब कामना पूरण करती है। पृथ्वी का दान जो लेता है और जो पृथ्वी को देता है॥३२॥ वे दोनों पुण्यात्मा निरन्तर स्वर्ग में जाते हैं। अन्य सब दानों का फल एक ही जन्म में मिलता है ॥ ३३ ॥ सुवर्ण, पृथ्वी, गौ, इनका फल सात जन्म तक मिलता है। जो पुरुष यह समझता हुआ

६ | बृहस्पतिस्मृतिः ॥

यो न हिंस्यादहं ह्यात्मा भूतग्रामंश्चतुर्विधम् ॥ ३४ ॥
तस्य देहाद्वियुक्तस्य भयं नास्तिकदाचन ।
अन्यायेन हृता भूमिर्येर्नरैरपहारिता ॥ ३५ ॥
हरन्तो हारयन्तश्च हन्युस्ते सप्तमं कुलम् ।
हरते हारयेद्यस्तु मन्दबुद्धिस्तमोवृतः ॥ ३६ ॥
सबद्धो वारुणैः पाशैस्तिर्यग्योनौ पुजायते ।
अश्रुभिः पतितैस्तेषां दानानामपकीर्तनम् ॥ ३७ ॥
ब्राह्मणस्य हृते क्षेत्रे हन्ति त्रिपुरुषंकुलम् ।
वापीकूपसहस्रेण अश्वमेधशतेन च ॥ ३८ ॥
गवां कोटिप्रदानेन भूमिहर्त्ता न शुद्ध्यति ।
गामेकां स्वर्णमेकं वा भूमेरप्यर्द्धमंगुलम् ॥ ३६ ॥
हरन्नरकमाप्नोति यावदाभूतसंप्लवम् ।
हुतं दत्तं तपोऽधीतं यत्किंचिद्धर्मसंचितम् ॥ ४० ॥
अर्द्धांगुलस्य सीमायां हरणेन प्रणश्यति ।


कि चार प्रकार के भूत समुदाय में मैं एक ही आत्मा विद्यमान हूं ऐसे विचार से चार प्रकार (अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज) के भूतों को दुःख नहीं देता ॥३४॥ देह से जुदे होने पर उस जीवात्मा को कभी भी भय नहीं है। जिन मनुष्यों ने अन्याय से पृथ्वी छीनी वा छिनवाई है ॥ ३५ ॥ वे दोनों छीनने और छिनवाने वाले अपने सात कुलों को नष्ट करते हैं। जो मन्द बुद्धि और अज्ञानी पृथिवी छीनते हुए की प्रेरणा करता है ॥ ३६ ॥ वह वरुण के फांसों में बंधा हुआ पशु आदि तिर्यग्योनि में पैदा होता है। जिनकी भूमि आदि छीनी गयी उनके आंसू पड़ने से दाता का दान भी नष्ट हो जाता है ॥ ३७ ॥ ब्राह्मण के खेत को जो छीन लेता है उसकी तीन पीढ़ी नष्ट होती हैं। हजार बावड़ी तथा कूपों के बनाने से, सौ अश्वमेध यज्ञ करने से ॥ ३८ ॥ तथा एक करोड़ गौओं के देने से भी पृथ्वी को हरने वाला शुद्ध नहीं होता। एक गौ एक सोना (असरफी) और पृथ्वी का आध अंगुल इनके ॥ ३९ ॥ हरनेने से प्रलय तक नरक में जाता है। होम, दान, तप, वेद का पढ़ना और जो कुछ पुण्य धर्म से संचित किया है वह सब ॥ ४० ॥ आधा

भाषार्थसंहिता ॥ ७

गोवीथींग्रामरथ्यांच श्मशानंगोपितंतथा ॥ ४१ ॥ संपीड्यनरकंयाति यावदाभूतसंप्लवम् । ऊषरेनिर्जलेस्थाने प्रास्तंसस्यंविसर्जयेत् ॥ ४२ ॥ जलाधारञ्चकर्त्तव्यो व्यासस्यवचनंयथा । पञ्चकन्यान्नृतेहन्ति दशहन्तिगवानृते ॥ ४३ ॥ शतमश्वान्नृतेहन्ति सहस्रंपुरुषानृते । हन्तिजातानजानांश्च हिरण्यार्थेनृतंवदन् ॥ ४४ ॥ सर्वंभूम्यनृतेहन्ति मास्मभूम्यनृतंवदीः । ब्रह्मस्वेनरतिंकुर्यात्प्राणैःकण्ठगतैरपि ॥ ४५ ॥ अनौपयमभैषज्यं विषमेतद्धलाहलम् । नविषंविषमित्याहुर्ब्रह्मस्वंविषमुच्यते ॥ ४६ ॥ विषमेकाकिनंहन्ति ब्रह्मस्वंपुत्रपौत्रकम् ।

अंगुल भूमि की सीमा हरने से नष्ट हो जाता है-गोओं का मार्ग, ग्राम की गली, श्मशान और गोषित (रखाया हुआ खेत) ॥ ४१ ॥ इनके बिगाड़ने से प्रलय तक नरक में जाता है। ऊपर और जहां जल न हो वहां खेत न वोवे ॥४२॥ व्यास जी के वचन के अनुसार कृपादि जलाशय खेत भरने आदि के लिये क-रना चाहिये। कन्या के निमित्त झूठ बोलने में पांच को, गौ के निमित्त झूठ बोलने में दश को ॥ ४३ ॥ घोड़े के निमित्त मिथ्या बोलने में सौ को, पुरुष के निमित्त झूठ बोलने में हज़ार को, सुवर्ण के निमित्त झूठ बोलने में जो पैदा हुए हैं तथा जो पैदा होंगे उन सब को ॥ ४४ ॥ और पृथ्वी के निमित्त झूठ बोलने में सब को मारता है इससे पृथ्वी के निमित्त झूठ मत बोलो। चाहें प्राण कंठ में आजायं, तो भी ब्राह्मण के धन से प्रीति न करै अर्थात् लेने की इच्छा न करे ॥ ४५ ॥ यह ब्राह्मण का धन लेलेना हलाहल विष है, जिसकी औषधि वा चिकित्सा नहीं है। क्योंकि बुद्धिमान् लोग कहते हैं कि विष, विष नहीं है किन्तु ब्राह्मण का धन मारलेना सर्वोपरि विष है ॥४६॥

क्योंकि विष एकको ही मारता है परन्तु ब्राह्मण का धन छीन लेना पुत्र पौत्रों को भी मारता है। लोहे तथा पत्थर का चूर्ण और विष इन को

८ बृहस्पतिस्मृतिः ॥

लोहचूर्णाश्मचूर्णंच विषञ्चजरयेन्नरः ॥ ४७ ॥
ब्रह्मस्वं त्रिषुलोकेषु कःपुमान्जरयिष्यति ।
मन्युप्रहरणाविप्रा राजानःशस्त्रपाणयः ॥ ४८ ॥
शस्त्रमेकाकिनंहन्ति ब्रह्ममन्युःकुलत्रयम् ।
मन्युप्रहरणाविप्राश्चक्रप्रहरणोहरिः ॥ ४९ ॥
चक्रात्तीव्रतरोमन्युस्तस्माद्विप्रन्नकोपयेत् ।
अग्निदग्धाःप्ररोहन्ति सूर्यदग्धास्तथैवच ॥ ५० ॥
मन्युदग्धस्यविप्राणामङ्कुरोनप्ररोहति ।
तेजसाग्निश्चदहति सूर्योदहतिरश्मिना ॥ ५१ ॥
राजादहतिदण्डेन विप्रोदहतिमन्युना ।
ब्रह्मस्वेनतुयत्सौख्यं देवस्वेनतुयारतिः ॥ ५२ ॥
तद्धनंकुलनाशाय भवत्यात्मविनाशनम् ।
ब्रह्मस्वंब्रह्महत्याच दरिद्रस्यचयद्धनम् ॥ ५३ ॥
गुरुमित्रहिरण्यंच स्वर्गस्थमपिपीड़येत् ।


भी मनुष्य पचा सकता है ॥४७॥ पर तीनों लोकों में ऐसा कोई पुरुष नहीं जो ब्राह्मण के धन को पचा सके। ब्राह्मणों का शस्त्र क्रोध है, राजाओं के हाथ में शस्त्र है ॥ ४ ॥ यह हाथ का शस्त्र एक को ही मारता है और ब्राह्मण का शोक तीन कुल को नष्ट करता है । ब्राह्मणों का प्रहार (शस्त्र) क्रोध और विष्णु का प्रहार चक्र है ॥ ४९ ॥ चक्र से क्रोध बड़ा पैना है, इससे ब्राह्मण को कुपित न करे वा न करावे अग्नि और सूर्य के जले भी जम आते हैं ॥ ५० ॥ और ब्राह्मणों के क्रोध से. दग्ध हुओं का अङ्कुर भी नहीं जमता, अग्नि अपने तेज से और सूर्य अपनी किरणों से दग्ध करते हैं ॥ ५१ ॥ राजा दण्ड से और ब्राह्मण क्रोध से दग्ध करता है। ब्राह्मण के धन से जो सुख भोग होता, देवता के धन से जो रति (क्रीड़ा) होती है ॥ ५२ ॥ वह धन, कुल और आत्मा को नष्ट करता है । ब्राह्मण का धन ब्राह्मण की हत्या और दरिद्र का जो धन ॥५३॥ गुरु और मित्र का सुवर्ण, ये स्वर्ग में रहने वाले को भी पीड़ित करते हैं ।

भाषाअर्थसहिता ॥

ब्रह्मस्वेनतुयच्छिद्रं तच्छिद्रंनप्ररोहति ॥ ५४ ॥ प्रच्छादयतितच्छिद्रमन्यत्रतुविसर्पति । ब्रह्मस्वेनतुपुष्टानिसाधनानिबलानिच ॥ ५५ ॥ संग्रामेतानिल्लीयन्ते सिकतासुयथोदकम् । श्रोत्रियायकुलीनाय दरिद्रायचवासव ! ॥ ५६ ॥ संतुष्टायविनीताय सर्वभूतहितायच । वेदाभ्यासस्तपोज्ञानमिन्द्रियाणांचसंयमः ॥ ५७ ॥ ईदृशायसुरश्रेष्ठ ! यद्दत्तंहितदक्षयम् । आमपात्रेयथान्न्यस्तं क्षीरंदधिघृतंमधु ॥ ५८ ॥ विनश्येत्पात्रदौर्बल्यात्तच्चपात्रंविनश्यति । एवंगांचहिरण्यंच वस्त्रमन्नंमहींतिलान् ॥ ५९ ॥ अविद्वान्प्रतिगृह्णाति भस्मीभवतिकाष्ठवत् । यस्यचैवगृहेमूर्खो दूरेचापिवहुश्रुतः ॥ ६० ॥ बहुश्रुतायदातव्यं नास्तिमूर्खेव्यतिक्रमः ।


और ब्राह्मण के धन को मार लेने से जो छिद्र नाम दोष लगता है वह नहीं मिटता ॥ ५४॥ यदि कोई उस छिद्र को छिपाता है तो भी वह छिपता नहीं । ब्राह्मण के धन से पुष्ट हुए अङ्गरूप साधन और सेना ॥५५॥ संग्राम में ऐसे लीन होजाते हैं जैसे रेत (वालू) में जल । हे इन्द्र ! कुलीन और दरिद्री वेद पाठी ब्राह्मण को ॥५६॥ जो सन्तोषी, नम्र, और सब प्राणियों का हितकारी हो, जो वेद का अभ्यासी हो, तपस्वी हो और इन्द्रियों का जीतने वाला हो ॥ ५७ ॥ हे देवताओं में उत्तम इन्द्र ! जो ऐसे ब्राह्मण को दिया जाय वह दान अक्षय पुण्यवाला होता है । कच्चे मट्टी के पात्र में रक्खा दूध, दही, घी सहत ॥५८॥ जैसे पात्र की दुर्बलता से नष्ट होता है और वह पात्र भी नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार गौ, सुवर्ण, वस्त्र, अन्न, पृथिवी, तिल इन को ॥ ५९ ॥ जो मूर्ख ब्राह्मण दान लेता है वह काष्ठ के समान भस्म होता है। जिस पुरुष के घर में मूर्ख ब्राह्मण हो और बहुश्रुत (पण्डित) दूर हो ॥६०॥ तो पण्डितको दान देवे किन्तु मूर्ख का उल्लंघन न माने। क्योंकि पण्डित को देने से हे इन्द्र !

१७ बृहस्पतिस्मृतिः ॥

कुलंतारयतेधीरः सप्तसप्तचवासव ! ॥ ६१ ॥ यस्तडागंनवं कुर्यात्पुराणंवापिखानयेत् । ससर्वंकुलमुद्धृत्य स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ६२ ॥ वापीकूपतडागानि उद्यानोपवनानिच । पुनःसंस्कारकर्ताच लभतेमौलिकंफलम् ॥ ६३ ॥ निदाघकालेपानीयं यस्यतिष्ठतिवासव ! । सदुर्गंविषमंकृत्स्नं नकदाचिदवाप्नुयात् ॥ ६४ ॥ एकाहंतुस्थितंतोयं पृथिव्यांराजसत्तम ! । कुलानितारयेत्तस्य सप्तसप्तपराण्यपि ॥ ६५ ॥ दीपालोकप्रदानेन वपुष्मान्सभवेन्नरः । प्रेक्षणीयप्रदानेन स्मृतिंमेधांचविन्दति ॥ ६६ ॥ कृत्वापिपापकर्माणि योदद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणायविशेषेण नसपापेनलिप्यते ॥ ६७ ॥ भूमिर्गावस्तथादाराः प्रसह्यह्रियतेयदा । नचावेदयतेयस्तु तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥ ६८ ॥


वह अपने इक्कीस कुलों को तारता है ॥ ६१ ॥ जो पुरुष नया तालाब बनवावे वा पुराने को खुदवावे, वह सब कुल का उद्धार करके स्वर्ग में पूजा जाता है ॥६२॥ वावड़ी, कूप, तड़ाग, बाग, और उपवन ( छोटा बगीचा ) इन का जो फिर संस्कार ( मरम्मत ) करता कराता है वह नये बनाने के फल को प्राप्त होता है ॥ ६३ ॥ ग्रीष्म ऋतुकाल में जिस के यहां जल रहता है वह कठोर विषम दुःख को कभी नहीं भोगता है ॥ ६४ ॥ जिस की खोदी हुई पृथिवी में एक दिन भी जल ठहरता है, हे राजाओं में उत्तम इन्द्र ! उस के अगले पिछले सात २ कुलों को तारता है ॥ ६५ ॥ दीपक के देने से सुन्दर शरीर वाला मनुष्य होता है और दर्शनीय वस्तु दान से स्मृति और बुद्धि को प्राप्त होता है॥६६॥

निन्दित पाप कर्म करके भी जो अभ्यागत वा भिक्षुक को और विशेष कर ब्राह्मण को अन्न देता है, वह पाप से दूषित नहीं होता ॥ ६७ ॥ जो पुरुष बल पूर्वक पृथिवी, गो और स्त्री इन को बिन कहे हर लेता है उस को ब्रह्महत्यारा कहते हैं ॥ ६८ ॥

भाषार्थसहिता ॥ १९

निवेदितञ्चराजानै ब्राह्मणैर्मन्युपीडितैः ।
ननिवारयतेयस्तु तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥ ६९ ॥
उपस्थितेविवाहेच यज्ञेदानेचवासव ! ।
मोहात्करोतिविघ्नंयः समृतोजायतेकृमिः ॥ ७० ॥
धनंफलतिदानेन जीवितंजीवरक्षणात् ।
रूपमारोग्यमैश्वर्यमहिंसाफलमश्नुते ॥ ७१ ॥
फलमूलाresource/शनात्पूजां स्वर्गस्सत्येनलभ्यते ।
प्रायोपवेशनाद्राज्यं सर्वंचसुखमश्नुते ॥ ७२ ॥
गवाढ्यःशक्रदीक्षायाः स्वर्गगामीतृणाशनः ।
स्त्रियस्त्रिपवणस्नायी वायुंपीत्वाक्रतुंलभेत् ॥ ७३ ॥
नित्यस्नायीभवेदर्कं संध्येद्वेचजपन्द्विजः ।
नवं साधयतेराज्यं नाकपृष्ठमनाशके ॥ ७४ ॥
अग्निप्रवेशेनियतं ब्रह्मलोकेमहीयते ।


क्रोध से दुःखित पीड़ित ब्राह्मणों की प्रार्थना करने पर भी जो राजा उस हरने वाले को नहीं रोकता उस को ब्रह्महत्यारा कहते हैं ॥ ६९ ॥ हे इन्द्र ! विवाह, दान, यज्ञ इन के समय में जो मोह से विघ्न करता है वह मरने के अनन्तर कीड़ा होता है ॥ ७० ॥ दान से धन और जीवों की रक्षा करने से जीवन फलता (बढ़ता) है। और रूप, आरोग्य, ऐश्वर्य, ये जो हिंसा न करने के फल हैं, इन को भोगता है ॥ ७१ ॥ फल और मूल खाने से मनुष्य पूजा प्रतिष्ठा को और सत्य से स्वर्ग को प्राप्त होता है। और मरण के निमित्त तीर्थ आदि पर बैठने से राज्य और संपूर्ण सुखों को भोगता है ॥ ७२ ॥ हे इन्द्र ! दीक्षा का उपदेश लेने से मनुष्य गौओं से युक्त होता और जो तृणों को खाता है वह स्वर्ग को प्राप्त होता है। तीन काल में जो स्नान करता है वह स्त्रियों को प्राप्त होता है। और वायु भक्षण करता हुआ तप करने वाला यज्ञों के फल को प्राप्त होता है ॥ ७३ ॥ जो मनुष्य नित्य स्नान करता और दोनों संध्याओं में सूर्य नारायण को जपता है वह नये राज्य और सदैव स्वर्गवास को प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥ जो अग्नि में प्रवेश करता है वह ब्रह्मलोक में पूजा

१२ बृहस्पतिस्मृतिः ॥

रसनाप्रतिसंहारे पशून्पुत्रांश्चविन्दति ॥ ७५ ॥
नाकेचिरंसवसते उपवासीचयोभवेत् ।
सततंचैकशायी यः सलभेदीप्सितांगतिम् ॥ ७६ ॥
वीरासनंवीरशय्यां वीरस्थानमुपाश्रितः ।
अक्षय्यास्तस्यलोकाः स्युः सर्वकामा गमास्तथा ॥ ७७ ॥
उपवासंचदीक्षांच अभिषेकंचवासव ! ।
कृत्वाद्वानदशवर्षाणि वीरस्थानाद्विशिष्यते ॥ ७८ ॥
अधीत्यसर्ववेदान्वै सद्योदुःखात्प्रमुच्यते ।
पावनंचरतेधर्मं स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ७९ ॥
बृहस्पतिमतंपुण्यं येपठन्तिद्विजातयः ।
चत्वारितेषांवर्द्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम् ॥ ८० ॥
इति श्रीबृहस्पतिप्रणीतं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥


जाता है, जो अपनी जिह्वा को वश में रखता है वह पशु और पुत्रों को प्राप्त होता है ॥ ७५ ॥ जो उपवास व्रत करता है वह चिरकाल तक स्वर्ग में वसता जो निरन्तर एक शय्या पर सोता अर्थात् एक ही स्त्री को भोगता है वह जिस गति को चाहता उसी को प्राप्त होता है ॥ ७६ ॥ जो वीरासन, वीर शय्या, और वीरस्थान का आश्रय लेता है उसके लिये सब लोक और सब काम अक्षय प्राप्त होते हैं ॥ ७७ ॥ उपवास, दीक्षा, और अभिषेक इनको जो बारह १२ वर्ष तक निरन्तर करता है वह वीरस्थान के फल से अधिक उत्तम फल पाता है ॥ ७८ ॥ सब वेदों को पढ़कर शीघ्र ही दुःख से छूटता, पवित्र धर्म करता और स्वर्ग लोक में पुजता है ॥ ७९ ॥ बृहस्पति के पवित्र मत को जो द्विजाती लोग पढ़ते हैं उनकी अवस्था, विद्या, यश, और बल, ये चारों बढ़ते हैं॥८०॥
यह बृहस्पति का रचा धर्मशास्त्र समाप्त हुआ ॥ १० ॥


श्रीगणेशायनमः ॥

अथ पाराशरस्मृतिप्रारम्भः

अथातोहिमशैलाग्रे देवदारुवनालये ।
व्यासमेकाग्रमासीनमपृच्छन्नृषयःपुरा ॥ १ ॥
मानुषाणां हितंधर्मं वर्तमानेकलौयुगे ।
शौचाचारंयथावच्च वदसत्यवतीसुत ! ॥ २ ॥
तच्छ्रुत्वाऋषिवाक्यंतु सशिष्योऽग्न्यर्कसन्निभः ।
प्रत्युवाचमहातेजाः श्रुतिस्मृतिविशारदः ॥ ३ ॥
नचाहंसर्वतत्वज्ञः कथंधर्मंवदाम्यहम् ।
अस्मत्पितैवप्रष्टव्य इतिव्यासःसुतोऽवदत् ॥ ४ ॥
ततस्तेऋषयःसर्वे धर्मतत्त्वार्थकाङ्क्षिणः ।
ऋषिंव्यासं पुरस्कृत्य गतावदरिकाश्रमम् ॥ ५ ॥
नानापुष्पलताकीर्णं फलपुष्पैरलङ्कृतम् ।


देवदारु वृक्षों के वन में हिमालय पर्वत के ऊपर एकाग्र बैठे हुए व्यास जी से पूर्वकाल में ऋषियों ने पूछा ॥ १ ॥ हे सत्यवती के पुत्र व्यासजी ! वर्तमान कलियुग में मनुष्यों का हितकारी धर्म शौच और आचार हमसे कहो ॥२॥
उक्त ऋषियों के वाक्य को सुनकर शिष्यों सहित अग्नि और सूर्य के तुल्य बड़े तेज वाले श्रुति और स्मृति में चतुर व्यासजी ऋषियों के प्रति बोले ॥ ३ ॥ कि हम सब तत्वों को नहीं जानते तब कैसे धर्म को कहें । हमारे पिता को ही यह विषय पूछौ यह पराशर के पुत्र व्यास ने कहा ॥४॥ तिसके अनन्तर धर्म के तत्त्व को चाहते हुए वे सब ऋषि लोग व्यास ऋषि को आगे लेकर बदरिकाश्रम ( बद्रीनारायण ) को गये ॥ ५ ॥ जो अनेक प्रकार के पुष्प लताओं

२ पाराशरस्मृतिः ॥

नदीप्रस्रवणोपेतं पुण्यतीर्थोपशोभितम् ॥ ६ ॥
मृगपक्षिनिनादाढ्यं देवतायतनावृतम् ।
यक्षगन्धर्वसिद्धैश्च नृत्यगीतैरलंस्कृतम् ॥ ७ ॥
तस्मिन्नृषिसभामध्ये शक्तिपुत्रंपराशरम् ।
सुखासीनंमहातेजामुनिमुख्यगणावृतम् ॥ ८ ॥
कृताञ्जलिपुटोभूत्वा व्यासस्तुऋषिभिःसह ।
प्रदक्षिणाभिवादैश्च स्तुतिभिःसमपूजयत् ॥ ९ ॥
अथसन्तुष्टहृदयः पराशरमहामुनिः ।
आहसुस्वागतंब्रूहीत्यासीनोमुनिपुंगवः ॥ १० ॥
व्यासःसुस्वागतंयेच ऋषयश्चसमन्ततः ।
कुशलंसम्यगित्युक्त्वा व्यासःपृच्छत्यनन्तरम् ॥
यदिजानासिमेभक्तिं स्नेहाद्वाभक्तवत्सल ! ॥ ११ ॥
धर्मंकथयमेतात ! अनुग्राह्योह्यहंतव ।
श्रुतामेमानवाधर्मा वासिष्ठाःकाश्यपास्तथा ॥ १२ ॥
गार्गीयागौतमीयाश्च तथाचौशनसाःस्मृताः ॥


के युक्त, फल फूलों के शोभायमान नदियों तथा झरनों से युक्त, पवित्र तीर्थों से जिस की शोभा है ॥ ६ ॥ मृग तथा पक्षियों के सुहावने शब्दों से युक्त, जिस में देवालय विद्यमान हैं, और जो यक्ष, गन्धर्व, सिद्ध, तथा अप्सरादि के नृत्य और गीतों से शोभा है ॥ ७ ॥ ऐसे बदरिकाश्रम में ऋषियों की सभा के बीच सुखपूर्वक बैठे तथा बड़े २ नामी अनेक मुनीश्वर जिन के चारों ओर बैठे हैं ऐसे शक्ति के पुत्र पाराशर का ॥८॥ ऋषियों सहित बड़े तेजस्वी व्यास जी ने हाथ जोड़ कर परिक्रमा अभिवादन और स्तुतियों से पूजन किया॥९॥ इस के अनन्तर मन से संतुष्ट हुए मुनियों में उत्तम पराशर महामुनि व्यास जी से बोले कि तुम भली प्रकार स्वागत ( आनन्द से आना ) कहो ॥ १० ॥ तब व्यास जी तथा अन्य ऋषियों ने कुशल पूर्वक आना कह कर पीछे व्यास जी ने यह पूछा कि हे भक्तवत्सल ! जो आप मेरी भक्ति को जानते हो कृपा से वा स्नेह से ॥ ११ ॥ हे पितः मुझ से धर्म कहिये क्योंकि मैं आप के अनुग्रह करने योग्य हूं—मैंने मनु, वशिष्ठ, कश्यप, ॥ १२ ॥ गर्ग, गौतम, उशना,

भाषार्थसंहिता ॥ ३

अत्रेर्विष्णोश्चसांवर्ता दाक्षादाङ्गिरसास्तथा ॥ १३ ॥ शातातपाञ्चहारीता याज्ञवल्क्यकृताश्चये । आपस्तम्बकृताधर्माः शंखस्यलिखितस्यच ॥ १४ ॥ कात्यायनकृताश्चैव तथाप्राचेतसान्मुनेः । श्रुताह्येतेभवत्प्रोक्ताः श्रौतार्थामेनविस्मृताः ॥ १५ ॥ अस्मिन्मन्वन्तरेधर्माः कृतत्रेतादिकेयुगे । सर्वेधर्माःकृतेजाताः सर्वेनष्टाःकलौयुगे ॥ १६ ॥ चातुर्वर्ण्यसमाचारं किंचित्साधारणंवद । चतुर्णामपिवर्णानां कर्त्तव्यंधर्मकोविदैः ॥ १७ ॥ ब्रूहिधर्मस्वरूपज्ञ सूक्ष्मंस्थूलञ्चविस्तरात् । व्यासवाक्यावसानेतु मुनिमुख्यःपराशरः ॥ १८ ॥ धर्मस्यनिर्णयंप्राह सूक्ष्मंस्थूलञ्चविस्तरात् । शृणुपुत्रप्रवक्ष्यामि शृण्वन्तुमुनयस्तथा । कल्पेकल्पे क्षयोत्पत्तौ ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ २० ॥ श्रुतिस्मृतिसदाचार निर्णेतारश्चसर्वदा ।


अत्रि, विष्णु, संवर्त, दक्ष, अंगिरा, ॥ १३ ॥ शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, ॥ १४ ॥ कात्यायन प्रचेता इन सब ऋषि मुनियों के कहे बनाये धर्मशास्त्र मैंने सुने हैं तथा आप के कहे वेद के अर्थ भी हम ने सुने और उन को हम भूले भी नहीं हैं ॥ १५ ॥ इस मन्वन्तर तथा कृत त्रेता आदि युगों में जो धर्म किये गये थे वे सब कलियुग में नष्ट हो गये ॥ १६ ॥ धर्म का मर्म जानने वालों को जो चारो वर्णों को कर्त्तव्य है वह चारों वर्णों का किंचित्साधारण आचार कहिये ॥ १७ ॥ हे धर्म के स्वरूप को जानने वाले ! सूक्ष्म और स्थूल आचार को विस्तार से कहिये । इस प्रकार व्यास जी के वचनों के पूर्ण होने पर मुनियों में मुख्य पराशर जी ने ॥ १८ ॥ सूक्ष्म और स्थूल धर्म का निर्णय विस्तार से कहा ॥ १९ ॥ हे पुत्र ! व्यास जी तथा अन्य मुनियो ! तुम सुनो कल्प २ में प्रलय तथा सृष्टि होने पर ब्रह्मा विष्णु और शिव ये तीनों ॥ २० ॥ श्रुति, स्मृति, और सदाचार के निर्णय करने वाले

४ | पाराशरस्मृतिः ॥

न कश्चिद्वेदकर्त्ता च वेदस्मर्त्ता चतुर्मुखः ॥ २१ ॥
तथैव धर्मान्स्मरति मनुः कल्पान्तरान्तरे ।
अन्ये कृतयुगे धर्मा स्त्रेतायां द्वापरे परे ॥ २२ ॥
अन्ये कलियुगे नॄणां युगरूपाऽनुसारतः ।
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते ॥ २३
द्वापरे यज्ञमेवाहु र्दानमेकं कलौ युगे ।
कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः ॥ २४ ॥
द्वापरे शंखलिखिताः कलौ पाराशराः स्मृताः ।
त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत् ॥ २५ ॥
द्वापरे कुलमेकन्तु कर्त्तारं तु कलौ युगे ।
कृते संभाषणादेव त्रेतायां चैव दर्शनात् ॥ २६ ॥
द्वापरे त्वन्नमादाय कलौ पतति कर्मणा ।
कृते तात्क्षणिकः शापस्त्रेतायां दशभिर्दिनैः ॥ २७ ॥


हैं। परन्तु वेद का बनाने वाला कोई नहीं है (इसी से वेद अपौरुषेय कहाता है) किन्तु चतुर्मुख ब्रह्मा जी पूर्व कल्प के अभ्यास किये वेद का सर्गारम्भ में स्मरण करने वाले हैं ॥२१॥ उसी प्रकार मनु जी कल्प २ में तथा प्रत्येक मन्वन्तर में धर्मों का स्मरण करते हैं। सतयुग, त्रेता, और द्वापर में मनुष्यों का धर्म भिन्न २ हो जाता बदलता रहता है ॥२२॥ युग के अनुसार कलियुग में अन्य धर्म हो जाता है। सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, ॥२३॥ द्वापर में यज्ञ और कलियुग में एक दान को ही मुख्य कहते हैं (इसी बात को चाहे यों कहो वा मानो कि तप ज्ञान यज्ञ और दान ये धर्म के चार पग हैं उन में से सत्युगी तप को, त्रेतायुगी ज्ञान को, द्वापरयुगी यज्ञ को और कलियुगी धर्मात्मा दान को मुख्य कर्त्तव्य मानते हैं) सतयुग में मनु के कहे त्रेता में गौतम के कहे धर्म विशेष कर चल सकते हैं ॥२४॥ द्वापर में शंख और लिखित के तथा कलियुग में पराशर के कहे धर्म मानने उचित हैं। सतयुग में धर्महीन देश को और त्रेता में धर्मविरोधी ग्राम को ॥२५॥ द्वापर में धर्म विरोधी कुल को और कलियुग में अधर्म करने वाले को त्याग दो और सतयुग में अधर्मी के साथ संभाषण करने से, त्रेता में उस के देखने से ॥२६॥ द्वापर में अन्न लेकर और कलियुग में कर्म करने से पतित होता है। सतयुग में उसी समय और त्रेता में दशदिन में शाप लगता ॥२७॥

भाषार्थसहिता ॥ ५

द्वापरेचैकमासेन कलौसंवत्सरेणतु ।
अभिगम्यकृतेदानं त्रेतास्वाहूयदीयते ॥ २८ ॥
द्वापरेयाचमानाय सेवयादीयतेकलौ ।
अभिगम्योत्तमंदानमाहूयैवतुमध्यमम् ॥ २९ ॥
अधमंयाच्यमानंस्यात् सेवादानन्तुनिष्फलम् ।
जितोधर्मोह्यधर्मेणसत्यंचैवानृतेनच ॥ ३० ॥
जिताश्चोरैश्चराजानः स्त्रीभिश्चपुरुषाजिताः ।
सीदन्तिचाऽग्निहोत्राणि गुरुपूजाप्रणश्यति ॥३१॥
कुमार्य्यश्चप्रसूयन्तेतस्मिन्कलियुगेसदा ।
कृतेत्वस्थिगताःप्राणास्त्रेतायांमांसमाश्रिताः ॥ ३२ ॥
द्वापरेरुधिरंयावत्कलौत्वन्नादिपुस्थिताः ।
युगेयुगेचयेधर्मास्तत्रतत्रचयेद्विजाः ॥ ३३ ॥
तेषांनिन्दानकर्तव्या युगरूपाहितेद्विजाः ।
युगेयुगेतुसामर्थ्यंशेषंमुनिविभाषितम् ॥ ३४ ॥

द्वापर में एक महीने में और कलियुग में एक वर्ष में शाप लगता है सतयुग में ब्राह्मण के समीप जाकर त्रेता में ब्राह्मण को अपने घर पर बुलाकर ॥२८॥ द्वापर में मांगने पर और कलियुग में जो सेवा करै उसे दान देते हैं अर्थात् दान के ये चार दर्जे हैं । ब्राह्मण के समीप जाकर दान देना सद्युगी सर्वो-त्तम है । समीप जाकर दिया जो दान है वह उत्तम और बुलाकर जो दिया वह मध्यम ॥ २९ ॥ मांगने वाले को जो दिया वह अधम और सेवक को जो दिया वह निष्फल है । कलियुग में अधर्म से धर्म, झूठ से सत्य ॥ ३० ॥ चोरों से राजा और स्त्रियों से पुरुष जीत लिये जाते अर्थात् दब जाते हैं । अग्निहोत्र बन्द हो जाते गुरु पूजा नष्ट हो जाती है ॥ ३१ ॥ कुमारी कन्याओं के सन्तान होते यह काम सदैव प्रत्येक कलियुग में होते हैं । सतयुग में प्राण हाड़ों में रहते त्रेता में मांस में ॥ ३२ ॥ द्वापर में रुधिर में और कलियुग में अन्न आदि में रहते हैं जिस २ युग में जो २ धर्म होते हैं और उस २ युग में जो द्विज हैं ॥३३॥ उनकी निन्दा न करनी चाहिये क्योंकि वे युग के अनुसारी हैं । और युग २ में जो सामर्थ्य मुनियों ने कहा है ॥ ३४ ॥

६ पराशरस्मृतिः ॥

पराशरेणचाप्युक्तं प्रायश्चित्तंविधीयते ।
अहमद्यैवतत्सर्वमनुस्मृत्यब्रवीमिवः ॥ ३५ ॥
चातुर्वर्ण्यसमाचारं शृण्वन्तुऋषिपुङ्गवाः ।
पराशरमतंपुण्यं पवित्रंपापनाशनम् ॥ ३६ ॥
चिन्तितंब्राह्मणार्थाय धर्मसंस्थापनायच ।
चतुर्णामपिवर्णाना माचारोधर्मपालकः ॥ ३७ ॥
आचारभ्रष्टदेहानां भवेद्धर्मःपराङ्मुखः ।
षट्कर्माभिरतोनित्यं देवतातिथिपूजकः ।
हुतशेषन्तुभुञ्जानो ब्राह्मणोनावसीदति ॥ ३८ ॥
सन्ध्यास्नानंजपोहोमः स्वाध्यायोदेवतार्चनम् ।
आतिथ्यंवैश्वदेवंच षट्कर्माणिदिनेदिने ॥ ३९ ॥
प्रियोवायदिवाद्द्वेष्यो मूर्खःपण्डितएववा ।
संप्राप्तोवैश्वदेवान्ते सोऽतिथिःस्वर्गसंक्रमः ॥ ४० ॥
दूराञ्चोपगतंश्रान्तं वैश्वदेवउपस्थितम् ॥


पराशर जी ने भी जो कहा है उसके अनुसार प्रायश्चित्त का विधान किया जाता है । उस सब को अभी स्मरण करके हम कहते हैं ॥ ३५ ॥ हे ऋषियों में उत्तम पुरुषो चारो वर्णों का आचरण सुनो क्योंकि पराशर का मत पुण्य का उत्पादक पवित्र तथा पापों का नाशक है ॥ ३६ ॥ जो मत ब्राह्मणों के लिये तथा धर्म की स्थिति के लिये विचारा है-चारो वर्णों का जो आचार है वही धर्म का रक्षक जानो ॥ ३७ ॥ जिन का देह आचार से भ्रष्ट है उन से धर्म भी पराङ्मुख होता पीठ फेर लेता है । जो छः कर्मों में नित्य तत्पर है तथा देवता और अतिथि का पूजन करता है और जो होम करके शेष बचे अन्न को खाता है वह ब्राह्मण दुःखी नहीं होता ॥३८॥ सन्ध्या स्नान जप होम विधि पूर्वक वेदाध्ययन और देवताओं का पूजन अतिथि की सेवा तथा वैश्वदेव–ये छः कर्म प्रति दिन करे । सन्ध्या स्नान जप ये तीनों अङ्गाङ्गिरूप से एक हैं ॥ ३९ ॥ पियारा हो वा शत्रु हो मूर्ख हो वा पण्डित हो जो वैश्वदेव के अन्त में प्राप्त हो वह अतिथि स्वर्ग में पहुंचाने वाला है ॥४०॥ जो दूर से आया हो थक गया हो वैश्वदेव के समय उपस्थित हो उस को

भाषार्थसहिता ॥

अतिथिंतंविजानीयान्नातिथिःपूर्वमागतः ॥ ४१ ॥
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रंसाङ्गमिकंतथा ।
अनित्यंह्यागतोयस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ ४२ ॥
अतिथिंतत्रसंप्राप्तं पूजयेत्स्वागतादिना ।
तथासनप्रदानेन पादप्रक्षालनेनच ॥ ४३ ॥
श्रद्धयाचान्नदानेन प्रियप्रश्नोत्तरेणच ।
गच्छतंश्चानुयानेन प्रीतिमुत्पादयेद्गृही ॥ ४४ ॥
अतिथिर्यस्यभग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्त्तते ।
पितरस्तस्यनाश्नन्ति दशवर्षाणिपञ्चच ॥४५ ॥
काष्ठभारसहस्रेण घृतकुंभशतेनच ।
अतिथिर्यस्यभग्नाशस्तस्यहोमोनिरर्थकः ॥ ४६ ॥
सुक्षेत्रेवापयेद्वीजं सुपात्रेनिःक्षिपेद्धनम् ।
सुक्षेत्रेचसुपात्रेच ह्युप्तंदत्तंननश्यति ॥ ४७ ॥
नपृच्छेद्गोत्रचरणे नस्वाध्यायंश्रुतंतथा ।
हृदयेकल्पयेद्देवं सर्वदेवमयोहिसः ॥ ४८ ॥


अतिथि जाने वैश्वदेव से पहिले आये ठहरे हुए को नहीं ॥ ४१ ॥ एक गांव में रहने वाले ब्राह्मण को तथा मेली ब्राह्मण को अतिथि कभी न माने जिस से नित्य जो न आवे उसे ही अतिथि कहा जाता है ॥४२॥ उस समय (वैश्वदेव में) आये अतिथि का (स्वागत) आदि से पूजन करे । तथा वैसे ही आसन देने-पग धोने ॥४३॥ श्रद्धा से अन्न देने प्रिय तथा मधुर प्रश्न और उत्तरों से जाते के पीछे चलने से गृहस्थी पुरुष अतिथिको प्रसन्न करै ॥४४॥ जिस के घर से निराश हो कर अतिथि चला जाता है उस के यहां पितर पन्द्रह वर्ष तक नहीं खाते ॥४५॥ काष्ठ के हजार बोझों से सौ घी के घड़ों से भी उसका होम वृथा है जिस के यहां से अतिथि निराश होकर लौट जाता है ॥४६॥ अच्छे खेत में बीज बोवे और सुपात्र को धन देवे क्योंकि अच्छे खेत में बोया बीज और सुपात्र को दिया दान नष्ट नहीं होता ॥ ४७ ॥ गोत्र वा चरण ( नाम कठ कौथुमादि ) अक्षमज्ञ और वेदाध्ययन इनको भी न पूछे अपने हृदय में अतिथि को देवता समझे क्योंकि अतिथि सब देवताओं का रूप है ॥ ४८ ॥