भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ९९

ऊहनव्यञ्जनार्थन्तु पश्वभावेऽपि पायसम् ।
सद्रवं श्रपयेत्तद्वदन्वष्टक्येऽपिकर्म्मणि ॥ ८ ॥
प्राधान्यपिण्डदानस्य केचिदाहुर्मनीषिणः ।
गयादौपिण्डमात्रस्य दीयमानत्वदर्शनात् ॥ ९ ॥
भोजनस्यप्रधानत्वं वदन्त्यन्येमहर्षयः ।
ब्राह्मणस्यपरीक्षायां महायत्नप्रदर्शनात् ॥ १० ॥
आमश्राद्धविधानस्य विनापिण्डैःक्रियाविधिः ।
तदालभ्याप्यनध्यायविधानश्रवणादपि ॥ ११ ॥
विद्वन्मतमुपादाय ममाप्येतद्धृदिस्थितम् ।
प्राधान्यमुभयोर्यस्मान्तस्मादेषसमुच्चयः ॥ १२ ॥
प्राचीनावीतिनाकार्यं पित्र्येषुप्रोक्षणंपशोः ।
दक्षिणोद्वासनान्तंच चरोर्निर्वपणादिकम् ॥ १३ ॥
सन्नयश्चावदानानां प्रधानार्थोनहीतरः ।


ऊहन और व्यञ्जन कर्म के लिये भी पशु के अभाव में पायस ही करे और अन्वष्टका श्राद्ध कर्म में उस पायस को सद्रव नाम ढीला पकावे ॥ ८ ॥ ऋषि कोई विद्वान् ऋषि श्राद्ध में पिण्डदान को ही प्रधान कहते हैं क्योंकि गया आदि तीर्थों में केवल पिण्ड ही दिया जाता है ॥ ९ ॥ और कोई ऋषि ब्राह्मणों को भोजन कराने को ही मुख्य कहते हैं क्योंकि ब्राह्मण की परीक्षा में मनु आदि धर्म शास्त्र में बहुत प्रयत्न किया देख जाता है ॥१०॥ अग्नि में न पकाये कन्द फलादि से होने वाले श्राद्ध का विधान यह है कि विना पिंड दिये ही कर्म करना श्रेष्ठ है। क्योंकि ब्राह्मण के मिलने पर भी अनध्याय की विधि शास्त्र से सुनी जाती है ॥११॥ विद्वानों के मत को स्वीकार करके हमारे भी हृदय में यही निश्चय हुआ है कि जिस कारण दोनों की प्रधानता है इससे यह समुच्चय अर्थात् पिण्डदान और श्रेष्ठ ब्राह्मण को भोजन देना ये दोनों होने चाहिये ॥१२॥ पितृ कर्मों में पशु का प्रोक्षण ( मन्त्रों से छिड़कना ) अपसव्य होकर करे और चरू के लिये चावल ग्रहण करने से लेकर पका के उतारने पर्यन्त सब कृत्य अपसव्य होकर करे ॥ १३ ॥ चरू के अवदानों का सञ्चय नाम संग्रह भी