भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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३६ | कात्यायनस्मृतिः ॥

क्षालनं दर्भकूर्चेन सर्वतः प्रोक्षणांस्तथा ।
तूष्णीमिच्छाक्रमेणस्या द्वपार्थेपाणदारुणी ॥ १ ॥
सप्ततावन्मूर्धन्यानि तथास्तनचतुष्टयम् ।
नाभिःश्रोणिरपानंच गोस्रोतांसिचतुर्दश ॥ २ ॥
क्षुरोमांसावदानार्थः कृत्स्वास्विष्टकृदावृता ।
वपामादायजुहुयात्तत्र मन्त्रंसमापयेत् ॥ ३ ॥
हृज्जिव्हाक्रोडमस्थीनि यकृद्वृक्कौगुदंस्तनाः ।
श्रोणिरंस्यसटापार्श्वं पश्वङ्गानिम्रचक्षते ॥ ४ ॥
एकादशानामङ्गानामवदाना निसंख्यया ।
पार्श्वस्यवृक्कसक्थ्नोश्च द्वित्वाहादुश्चतुर्दश ॥ ५ ॥
चरितार्थाश्रुतिःकार्या यस्मादप्यनुकल्पशः ।
अतोऽष्टर्च्चनहोमःस्याच्छागपक्षेचरावपि ॥ ६ ॥
अवदानानियावन्ति क्रियेरन्प्रस्तरेपशोः ।
तावन्तःपायसान्पिण्डान्पश्वभावेपिकारयेत् ॥ ७ ॥


यज्ञ सम्बन्धी पशु के इन्द्रिय वा छिद्रों का दाभ के कूंसे से अपनी इच्छानुकूल क्रम से (तूष्णीं) बिना मन्त्र पढ़े प्रक्षालन करे। और वपाश्रपणी नामक यज्ञपात्र [जिस पर रख के वपा पकाई जाती है] ढांक के पत्तों की वा काष्ठ की होनी चाहिये गौ के शरीर में चौदह छिद्र होते हैं सात तो ऊपर, शिर में चार ४ थन, नाभी, (डोंडी) योनी और गुदा ॥२॥ मांस के टुकड़े करने के लिये छुरा होता है । प्रधान के बाद क्रम से वपा को लेकर सब स्विष्टकृत पर्यन्त होम करे और उस समय मन्त्र को समाप्त करे अर्थात् प्रधान याग और स्विष्टकृत दोनों मन्त्रों को मिलाकर एकही वार वपा की आहुति देवे ॥ ३ ॥ हृदय, जिह्वा, गोड़, हड्डी, जिगर, वृषण, गुदा, स्तन, श्रोणी, कन्धे और सटा (ठाठे) के दोनों पार्श्व ये पशु के अंग कहाते हैं ॥ ४ ॥ इन ग्यारह अङ्गों के अवदान नाम टुकड़े लेखानुसार गिनती मे होते हैं और पार्श्व, वृषण [अण्डकोश] और सक्थी जांघ, ये दो २ होते हैं इस से पशु के चौदह अङ्ग कहे हैं ॥ ५ ॥ प्रत्येक कल्पोक्त कामों में श्रुति को चरितार्थ करना चाहिये ॥ इस से बकरा और चरूदोनों पक्षों में आठ ऋचाओं से होम करना चाहिये ॥६॥ यज्ञ पशु के अंगों के जितने अवदान नाम टुकड़े, प्रस्तर नामक कुशों पर कर के रक्खे जांय उतने ही पायस नाम खीर के पिण्ड पशु न हो, तब भी करावे ॥७॥