भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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७० कात्यायनस्मृतिः ॥

यच्छ्राद्धंकर्मणामादौ याचान्तेदक्षिणाभवेत् ।
अमावास्यांद्वितीयंयदन्वाहार्य्यंतदुच्यते ॥ १ ॥
एकसाध्येष्वबर्हिःषु नस्यात्परिसमूहनम् ।
नोदगासादनञ्चैव क्षिप्रहोमाहितेमताः ॥ २ ॥
अभावेब्रीहियवयोर्दध्नावापयसापिवा ।
तदभावेयवाग्वावा जुहुयादुदकेनवा ॥ ३ ॥
रौद्रन्तुराक्षसंपित्र्यमासुरञ्चाभिचारिकम् ।
उक्त्वामन्त्रंस्पृशेदाप आलभ्यात्मानमेवच ॥ ४ ॥
यजनीयेन्हिसोमञ्चेद्वारुण्यांदिशिदृश्यते ।
तत्रव्याहृतिभिर्हुत्वा दण्डंदद्याद्द्विजातये ॥ ५ ॥
लवणंमधुमांसंच क्षारांशोयेनहूयते ।
उपवासेनभुञ्जीत नोरुरात्रौनकिंचन ॥ ६ ॥
स्वकालेसायमात्याह अप्राप्तौहोतृहव्ययोः ।


कर्मों के आदि में जो आभ्युदयिक श्राद्ध होता है और कर्मों के अन्त में जो दक्षिणा दीजाती है और अमावस को जो दूसरा श्राद्ध होता है उसे अन्वाहार्य्य कहते हैं ॥ १ ॥

एक साथ होने वाले, जिन में बर्हिनामक कुश न लिये गये हों ऐसे होमों में परिसमूहन और उत्तर २ पात्रों का रखना नहीं होता क्योंकि वे शीघ्र होने वाले होम कहाते हैं ॥ २ ॥

ब्रीहि और जौ के अभाव में दही या दूध से और उन के भी अभाव में ढीले रांधे हुए चावलों से, यदि ये भी न मिलें तो केवल जल से होम करें ॥ ३ ॥

रुद्र, राक्षस, पितर, असुर और अभिचार नाम शत्रु वध का जिन में विशेष कर वर्णन हो ऐसे मन्त्रों का उच्चारण करके अपने हृदय का स्पर्श कर दहिने हाथ से जल स्पर्श करे ॥ ४ ॥

यदि दर्शेष्टि के दिन संध्या के समय पश्चिम दिशा में चन्द्रमा दीख पड़े तो वहां व्याहृति [ भूः आदि ] यों से होम करके किसी ब्राह्मण को एक छड़ी दान में देवे ॥ ५ ॥

लवण, सहत, मांस, और खार इन का अग्नि में जो होम करता है वह दिन में उपवास करे और रात्रि में भी मध्यम भोजन करे न बहुत कम न अधिक ॥६॥

सायंकाल की आहुति के समय पर यदि होता और हविष्यान्न न मिलें