भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 295

५४ कात्यायनस्मृतिः ॥

योदहेदग्निहोत्रेण स्वेनभार्यांकथंचन । सास्त्रीसंपद्यतेतेन भार्यावास्यपुमान्भवेत् ॥ ११ ॥ भार्यामरणमापन्ना देशान्तरगतापिवा । अधिकारीभवेत्पुत्रो महापातकिनिद्विजे ॥ १२ ॥ मान्याचेन्म्रियतेपूर्वं भार्यापतिविमानिता । त्रीणिजन्मानिसापुंस्त्वं पुरुषःस्त्रीत्वमर्हति ॥ १३ ॥ पूर्व्वयोनिःपूर्वावृत् पुनराधानकर्म्मणि । विशेषोवाम्युपस्थानमाज्याहुत्यष्टकंतथा ॥ १४ ॥ कृत्वाव्याहृतिहोमान्तमुपतिष्ठेतपावकम् । अध्यायःकेवलाग्नेयः कस्नेजामिरमानसः ॥ १५ ॥ अग्निमीडेअग्नआयाह्यग्नआयाहिवीतये । तिस्रोऽग्निज्योतिरित्याग्निं दूतमग्नेमृडेतिच ॥ १६ ॥ इत्यष्टावाहुतीर्हुत्वायथाविध्यनुपूर्व्वशः । पूर्णाहुत्यादिकंसर्व्वमन्यत्पूर्व्ववदाचरेत् ॥ १७ ॥


जो अपने अग्निहोत्र के अग्नि से कदाचित् पीछे विवाहि अप्रधान स्त्री का दाह करे तो वह पुरुष जन्मान्तर में स्त्री होता और वह स्त्री पुरुष बनती है ॥ ११ ॥ यदि स्त्री मर गई हो वा विदेश में चली गई हो अथवा अग्निहोत्री पुरुष को ही महापातक लगगया हो, तो अग्निहोत्र का अधिकारी पुत्र होता है ॥ १२ ॥ यदि पति के तिरस्कार^त करने से मान के योग्य पहिली ज्येष्ठा स्त्री पहिले मर जाय तो वह स्त्री तीन जन्म तक पुरुष बनती और पुरुष तीन जन्म तक स्त्री बनता है ॥ १३ ॥ दूसरे अग्नि के आधान में पहिले ही योनि ( अरणी ) और आवृत् होते हैं केवल अग्नि का उपस्थान और आठ घी की आहुतियों की विशेषता है ॥ १४ ॥ व्याहृतियों से होम तक कृत्य करके अग्नि का उपस्थान करे और उस स्तुति में केवल अग्नि का अध्याय १ ( कस्तेजामिरमानसः २ ) ॥ १५ ॥ और ( अग्निमीडे ३ ) ( अग्न आयाह्यग्निभिः ४ । ऋ० प्र० ६ । अ० ४ । व० १४ ) ( अग्न आयाहिवीतये ० ५ ऋ० ४ । ५ । २२ ) ( अग्निज्योतिः ० ६ ) ( अग्निंदूतं वृणीमहे ० ऋ० १ । १ । २२ ) ( अग्नेमृडमहाँ असि ० ८ ऋ० ३ । ५ । ९ ) ॥ १६ ॥ इन आठ आहुतियों को क्रम से विधि पूर्वक देकर पूर्णाहुति आदि सब अन्य कर्म पूर्व के समान करे ॥ १७ ॥