भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ५३

ज्येष्ठाचेद्बहुभार्य्यस्य अतिचारेणगच्छति । पुनराधानमत्रैक इच्छन्तिनतुगौतमः ॥ ४ ॥ दाहयित्वाग्निभिर्भार्य्यां सदृशींपूर्वसंस्थिताम् । पात्रैश्चाथाग्निमादध्यात्कृतदारोऽविलम्बितः ॥ ५ ॥ एवंवृत्तांसवर्णांस्त्रीं द्विजातिःपूर्वमारणीम् । दाहयित्वाग्निहोत्रेण यज्ञपात्रैश्चधर्म्मवित् ॥ ६ ॥ द्वितीयांचैवयःपत्नीं दहेद्वैतानिकाग्निभिः । जीवन्त्यांप्रथमायां तु ब्रह्मघ्नेनसमंहितन् ॥ ७ ॥ मृतायांत्तुद्वितीयायां योऽग्निहोत्रंसमुत्सृजेत् । ब्रह्मोज्झंतंविजानीयाद्यश्चकामात्समुत्सृजेत् ॥ ८ ॥ मृतायामपिभार्य्यायां वैदिकाग्निंनहित्यजेत् । उपाधिनापितत्कर्म यावज्जीवंसमापयेत् ॥ ९ ॥ रामोऽपिकृत्त्वासौवर्णीं सीतांपत्नींयशस्विनीम् । ईजेयज्ञैर्बहुविधैः सहभ्रातृभिरच्युतः ॥ १० ॥


यदि बहुत स्त्री वाले पुरुष की जेठी स्त्री व्यभिचार आदि से चली जाय भाग जाय तो ऐसी अवस्था में कोई ऋषि फिर अग्नि का आधान कहते हैं और गौतम ऋषि नहीं कहते ॥ ४ ॥ अपने वर्ण की और पहिले जो मरी ऐसी स्त्री को स्थापित अग्नियों से पात्रों सहित जला करके शीघ्र ही विवाह कर विधि पूर्वक अग्नि का फिर आधान करे ॥ ५॥ धर्मनिष्ठ धर्मज्ञ द्विजाति पुरुष ऐसे आचरण वाली पूर्व मरी सवर्णा स्त्री को अग्निहोत्र के अग्नि से यज्ञपात्रों सहित दग्ध करके फिर से अग्निहोत्र लेवे ॥ ६ ॥ पीछे बियाही दूसरी स्त्री को स्थापित अग्नि से जो पुरुष पहिली स्त्री के विद्यमान होने पर जलाता है वह ब्रह्म हत्यारे के समान है ॥ ७ ॥ पीछे से विवाहित दूसरी स्त्री के मर जाने पर जो पुरुष इच्छा पूर्वक अग्निहोत्र को त्यागता है उस को वेद त्यागने का अपराधी जानो ॥ ८ ॥ मुख्य स्त्री के मर जाने पर भी वैदिक अग्नि का परित्याग न करे उपाधि (कुशा वा धातु की स्त्री बनाकर) से भी अपने जीवने तक अग्निहोत्र कर्म को पूरा करे ॥ ९॥ महाराजा अच्युत भगवान् श्रीरामचन्द्र जी ने भी यश-वाली सोने की-सीता स्त्री को बना कर भाइयों सहित बड़े २ यज्ञ किये ॥१०॥