भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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५२ कात्यायनस्मृतिः ॥

नह्याहिताग्नेःस्वकर्म लौकिकेऽग्नौविधीयते ॥१४॥
षडाहुतिकमन्येन जुहुयाद्ध्रुवदर्शनात् ।
नह्यात्मनोऽर्थंस्यात्तावद्यावन्नपरिणीयते ॥१५॥
पुरस्तात्त्रिविकल्पं यत्प्रायश्चित्तमुदाहृतम् ।
तत्षडाहुतिकंशिष्टैर्यज्ञविद्भिःप्रकीर्तितम् ॥१६॥
इति कात्यायनस्मृत्तावेकोनविंशः खण्डः ॥१९॥
इति कात्यायनविरचिते कर्मप्रदीपे द्वितीयः प्रपाठकः ॥२॥
असमक्षन्तुदम्पत्योर्होतव्यंनर्त्विगादिना ।
द्वयोरप्यसमक्षंहि भवेद्धुतमनर्थकम् ॥१॥
विहायाग्निंसभार्यश्चेत्सीमामुल्लङ्घ्यगच्छति ।
होमकालात्ययेतस्य पुनराधानमिष्यते ॥२॥
अरण्योःक्षयनाशाग्निदाहेष्वग्निंसमाहितः ।
पालयेदुपशान्तेस्मिन् पुनराधानमिष्यते ॥३॥


करे लौकिक अग्नि में कदापि नहीं क्योंकि अग्निहोत्री का निज कर्म लौकिक अग्नि में करना शास्त्र में विहित नहीं है ॥ १४ ॥ विवाह में होने वाले ध्रुव दर्शन कर्म के पश्चात् प्रायश्चित्त की छः आहुति का भी अन्य अग्नि में होम न करे । पाणिग्रहण और सप्तपदी से पहिले का होम पत्नी भाव न होने के कारण अपने लिये नहीं माना जायगा ॥ १५ ॥ पहिले जो त्रिविकल्प वाला प्रायश्चित्त कह आये हैं उस को ही यज्ञ के जानने वाले शिष्ट (सज्जन) लोग षडाहुतिक कहते हैं ॥ १६ ॥ यह १९ वां खण्ड पूरा हुआ ॥

कात्यायन के रचे कर्म प्रदीप में २ द्वितीय प्रपाठक पूरा हुआ ॥

स्त्री पुरुष दोनों के परोक्ष में ऋत्विज् आदि कोई स्थापित अग्नि में होम न करे क्योंकि पति पत्नी दोनों की अनुपस्थिति में होम निष्फल होता है ॥१॥ यदि अग्नि को छोड़ कर पत्नी को साथ लेके पुरुष ग्राम की सीमा को लांघ कर चला जाय और उस के होम का समय बीत जाय तो वह फिर से विधिपूर्वक अग्नि का आधान करे ॥ २ ॥ अरणियों का नाश हो जाने वा अग्नि में जल जाने पर सावधानी से अग्नि की रक्षा करे तथापि यदि अग्नि शान्त हो जाय तो फिर से विधिपूर्वक अग्नि का आधान करे ॥ ३ ॥

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