भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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४४ कात्यायनस्मृतिः ॥

धूपंचैवानुपूर्व्येण ह्यग्नौकुर्यादनन्तरम् ॥ ११ ॥ अग्नौकरणहोमश्च कर्तव्य उपवीतिना । प्राङ्मुखेनैवदेवेभ्यो जुहोतीतिश्रुतिःश्रुता ॥ १२ ॥ अपसव्येनवाकार्यो दक्षिणाभिमुखेनच । निरुप्यहविरन्यस्मा अन्यस्मै नहिहूयते ॥ १३ ॥ स्वाहाकुर्यान्नचात्रान्ते नचैवजुहुयाद्धविः । (स्वाहाकारेणहुत्वाग्नौ पश्चान्मन्त्रंसमापयेत्) ॥ १४ ॥ पित्र्येयःपङ्क्तिमूर्द्धन्यस्तस्यपाणावनग्निमान् । हुत्वामन्त्रवदन्येषां तूष्णींपात्रेषुनिःक्षिपेत् ॥ १५ ॥ नोंकुर्याद्धोममन्त्राणां पृथगादिषुकुत्रचित् । अन्येषांचाविकृष्टानां कालेनाचमनादिना ॥ १६ ॥ सव्येनपाणिनेत्येवं यदत्रसमुदीरितम् । परिग्रहणमात्रंतत् सव्यस्यादिशतिव्रतम् ॥ १७ ॥ पिञ्जल्यद्याभिसंगृह्य दक्षिणेनेतरात्करात् ।


देकर क्रम से सब को धूप देवे ॥११॥ अग्नौकरण नामक श्राद्ध सम्बन्धी होम सव्य होकर करे और पूर्व को मुख करके ही देवताओं के लिये होम करे यह वेद में लिखा है ॥ १२ ॥ अथवा दक्षिण को मुख करके अपसव्य होकर करे और अन्य देवता के नाम से हविष् ग्रहण करके किसी अन्य के नाम से होम न करे ॥१३॥ और इस अग्नौकरण होम में मन्त्र के अन्त में स्वाहा न कहे न हविष् का होम करे किन्तु पहिले केवल स्वाहा कह कर होम करके पीछे पूरा मन्त्र पढ़े ॥१४॥ पितृ कर्म में जो ब्राह्मण पंक्ति में मुख्य हो उसके हाथ में विधिपूर्वक अग्निस्थापन न करने वाला ब्राह्मण मन्त्र पढ़कर आहुति देवे और शेष ब्राह्मणों के पात्रमें बिना मन्त्र हविष् को वह रक्खै जो अग्निहोत्री न हो ॥१५॥ होम के मन्त्रोंकी आदि में कहीं भी पृथक् २ ओं न कहे-और आचमनादि काल के समीप के अन्य मन्त्रों में भी आदि में प्रणव का उच्चारण न करे ॥ १६ ॥ जो यहां श्राद्ध में वाम हाथ से कर्म करना कहा है सो दहिने हाथ को वाम से सब ओर से ग्रहण करके वह कर्म करे किन्तु केवल वाम से नहीं ॥१७॥ पिञ्जली आदि कुशों को दहिने हाथ से ग्रहण करके वांएं हाथ से दहिने हाथ को साथ कर