अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ४५
अन्वारभ्यचसव्येन कुर्यादुल्लेखनादिकम् ॥ १८ ॥
यावदर्थमुपादाय हविषोऽर्भकमर्भकम् ।
चरुणासहसन्नीय पिण्डान्दातुमुपक्रमेत् ॥ १९ ॥
पितुरुत्तरकर्बंशे मध्यमेमध्यमस्यतु ।
दक्षिणेतत्पितुश्चैव पिण्डान्पर्वणिनिर्वपेत् ॥ २० ॥
वाममावर्तनंकेचिदुदगन्तंप्रचक्षते ।
सर्वंगौतमशाण्डिल्यौ शाण्डिल्यायनएवच ॥ २१ ॥
आवृत्यप्राणमायम्य पितॄन्ध्यायन्यथार्थतः ।
जपंस्तेनैवचावृत्य ततःप्राणंप्रमोचयेत् ॥ २२ ॥
शाकंचफाल्गुनाष्टम्यां स्वयंपत्त्यपिवापचेत् ।
यस्तुशाकादिकोहोमः कार्योंऽपूपाष्टकावृतः ॥ २३ ॥
आन्वष्टक्यांमध्यमायामितिगोभिलगौतमौ ।
वार्कखण्डिञ्चसर्वासु कौत्सोमेनेष्टकासुच ॥ २४ ॥
स्थालीपाकंपशुस्थाने कुर्याद्यद्यनुकल्पितम् ।
श्राद्ध में उल्लेखन आदि कर्म करे ॥ १८ ॥ थोड़ा २ प्रयोजन मात्र हविष् लेकर चरु के संग मिला के पिण्ड देने का प्रारम्भ करे ॥ १९ ॥ पिण्ड देने के लिये दक्षिणा को बिछाये कुशों के उत्तर भाग में पिता के नाम से, उस से दक्षिण मध्य कुशों पर पितामह के नाम से और उस से भी दक्षिण में प्रपितामह के नाम से पिण्ड देवे ॥ २० ॥ वामावर्तन (दक्षिण दिशा से प्राणों को रोक कर उत्तरतक ले जाना) को उत्तर दिशा तक करना यह गौतम शांडिल्य और शांडिल्यायन सब ऋषि कहते हैं ॥ २१ ॥ प्राणों को रोक कर ठीक २ पितरों का ध्यान करता तथा प्राणायाम के मन्त्र को जपता हुआ उत्तर को जाकर लौट आके श्वास को छोड़े ॥ २२ ॥ फालगुन की अष्टमी के दिन स्वयं पुरुष अथवा पत्नी शाक को पकावे और जो शाक आदि का होम है वह आठ अपूपों सहित श्राद्ध में करे ॥ २३ ॥ और अन्वष्टका (नवमी) का श्राद्ध मध्यमा (बीच की) अष्टका पर करे यह गोभिल और गौतम ऋषि कहते हैं । वार्कखणिड और कौत्स ऋषि यह कहते हैं कि सब तीनों अष्टकाओं में अन्वष्टका श्राद्ध करे ॥ २४ ॥ और जहां अष्टकादि श्राद्ध में पशु का