अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 287, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ कात्यायनस्मृतिः ॥
क्षपयेत्तं सवत्सायास्तरुण्यागोपयस्यनु ॥ २५ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ सप्तदशः खण्डः ॥ १७ ॥
सायमादिप्रातरन्तमेकंकर्मप्रचक्षते ।
दर्शान्तंपौर्णमास्याद्यमेकमेवमनीषिणः ॥ १ ॥
ऊर्ध्वंपूर्णाहुतेर्दर्शः पौर्णमासोऽपिवाग्रिमः ।
यआयातिसहोतव्यः सएवादिरितिश्श्रुतिः ॥ २ ॥
ऊर्ध्वंपूर्णाहुतेःकुर्यात् सायंहोमादनन्तरम् ।
वैश्वदेवंतुपाकान्ते बलिकर्मसमन्वितम् ॥ ३ ॥
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चादभिरूपान्स्वशक्तितः ।
यजमानस्ततोऽश्नीयादितिकात्यायनोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥
वैवाहिकाग्नौकुर्वीत सायं॑प्रातस्त्वतन्द्रितः ।
चतुर्थीकर्मकृत्त्वैतदेतच्छाट्यायनेर्मतम् ॥ ५ ॥
ऊर्ध्वंपूर्णाहुतेःप्रातर्हुत्वातांसांयमाहुतिम् ।
लेख हो वहां पशु के स्थान में स्थालीपाक बना के श्राद्ध करे और उसे बछड़े वाली तरुणा गौके दूध में पकावै ॥ २५ ॥
यह १७ सत्रहवां खण्ड पूरा हुआ ॥
सायंकाल से लेकर प्रातःकाल तक दो भाग में विभक्त एक ही कर्म गिना जाता है और पौर्णमासेष्टि से लेकर दर्शैष्टि तक दो भाग में विभक्त एक ही कर्म कहाता है ॥ १ ॥ श्रौत अग्न्याधान में कही पूर्णाहुति के पश्चात् दर्श वा पौर्णमास जिस इष्टि का समय आवे उसी को पहिले करे वही प्रथम इष्टि होगी—ऐसा श्रुति में कहा है ॥ २ ॥ अग्निस्थापन की पूर्णाहुति हो जाने पर जब तक स्थापित अग्नि में सायंकाल का अग्निहोत्र न हो चुके तब तक अन्य वैश्वदेवादि न करे किन्तु सायं होम के बाद पाक बनने पर वैश्वदेव होम तथा बलिकर्म करे ॥ ३ ॥ फिर अपनी शक्ति के अनुसार जो पण्डित हों ऐसे ब्राह्मणों को जिमा के यजमान भोजन करे यह कात्यायन ऋषि कहते हैं ॥ ४ ॥ चतुर्थीकर्म होजाने पर गृहस्थ पुरुष निरालस्य होके सायं प्रातःकाल विवाह के अग्नि में अग्निहोत्र करे यह शाट्यायन ऋषि का मत है ॥ ५ ॥ पूर्णाहुति के उपरान्त उस सायंकाल की आहुति को एक बार प्रातःकालीन होम के साथ