अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ४१
प्रातर्होमस्तदैवस्यादेषएवोत्तरोविधिः ॥ ६ ॥
पौर्णमासात्ययेहव्यं होतावायदहर्भवेत् ।
तदहर्जुहुयादेवममावास्यात्ययेपिच ॥ ७ ॥
अहूयमानेनन्नंशं चेन्नयेत्कालं समाहितः ।
सम्पन्नेतुयथातत्र हूयतेतदिहोच्यते ॥ ८ ॥
अहुताःपरिसंख्याय पात्रेकृत्वाहुतीः सकृत् ।
मन्त्रेणविधिवद्धुत्वाधिकमेवापराअपि ॥ ९ ॥
यत्रव्याहृतिभिर्होमः प्रायश्चित्तात्मकोभवेत् ।
चतस्रस्तत्रविज्ञेयाः स्त्रीपाणिग्रहणेयथा ॥ १० ॥
अपिवाज्ञातमित्येषा प्राजापत्यापिवाहुतिः ।
होतव्यात्रिविकल्पोऽयं प्रायश्चित्तविधिःस्मृतः ॥ ११ ॥
यद्यग्निरग्निनान्येन संभवेदाहितःक्वचित् ।
अग्नयेविविचयेइति जुहुयाद्वाघृताहुतिम् ॥ १२ ॥
प्रथम करके आगे सायं प्रातःकाल की आहुति अपने २ समय में किया करे यही विधान जानो ॥ ६ ॥ पौर्णमासेष्टि और दर्शेट्टि का नियत समय किसी कारण निकल जाय तो जिस दिन पुरोडाशादि हविष् वा होता मिले उसीदिन उन इष्टियों को विधि पूर्वक करे ॥ ७ ॥ यह कब करे जब जितने दिन होम न भया हो उतने दिन विना भोजन किये बिताये हों—और सम्पन्न (यदि भोजन किया हो) हो तो जैसे होम करे वह रीति यहां कहते हैं ॥ ८ ॥ जितनी आहुति न दी हों उतनी गिन कर एक पात्र में रक्खे वा कुछ अधिक रख के उन सब को मन्त्र से विधि पूर्वक अग्नि में होम करके पश्चात् उस दिन की आहुति देवे ॥ ९ ॥ जहां प्रायश्चित्त के निमित्त व्याहृतियों से होम कहा हो वहां विवाह के तुल्य चार आहुति जाने अर्थात् तीन पृथक् २ और एक तीनों व्याहृति मिला के देवे ॥ १० ॥ अथवा (अज्ञातं०) इस मन्त्र से वा प्रजापति के मन्त्र से आहुति देवे इस प्रकार यह प्रायश्चित्त विधि तीन विकल्प युक्त कहा है ॥ ११ ॥ यदि स्थापित किया अग्नि दूसरे लौकिक अग्नि से कभी मिल जाय तो (अग्नये विविचये०) इस मन्त्र से चावल आदि नियत किये हविष् की आहुति अथवा प्रायश्चित्तार्थ घी से ही आहुति देवे ॥ १२ ॥