अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 289, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ कात्यायनस्मृतिः ॥
अग्नयेऽप्सुमतेचैव जुहुयाद्वैघृतेनचेत् । अग्नयेशुचयेचैव जुहुयाच्चदुरग्निना ॥ १३ ॥ गृहदाहाग्निनाग्निस्तु यष्टव्यःक्षामवांद्विजैः । दावाग्निनाचसंसर्गे हृदयंयदतिप्यते ॥ १४ ॥ द्विर्भूतोयदिंसंसृज्ये त् संसृष्टमुपशामयेत् । असंसृष्टंजागरयेद्गिरिशर्मैवमुक्तवान् ॥ १५ ॥ नस्वेऽग्नावन्यहोमःस्यान् मुक्त्वाैकांसमिदाहुतिम् । स्वर्गवासक्रियार्थांञ्च यावन्नासौप्रजायते ॥ १६ ॥ अग्निस्तुनामधेयादौ होमेसर्वत्रलौकिकः । नहिपित्रासमानीतः पुत्रस्यभवतिक्वचित् ॥ १७ ॥ यस्याग्नावन्यहोमःस्यात् सर्वैश्वानरदैवतम्। चरुंनिरूप्यजुहुयात् प्रायश्चित्तंतुतस्यतत् ॥ १८ ॥ परेणाग्नौहुतेस्वार्थं परस्याग्नौहुतेस्वयम् ।
किसी निकृष्ट अग्नि के साथ स्थापित अग्नि के मिल जाने पर यदि घी से ही आहुति देवे तो (अग्नयेऽप्सुमते०) इस मन्त्र से और (अग्नये शुचये०) इस मन्त्र से प्रायश्चित्तार्थ होम करे ॥१३॥ यदि घर में लगे हुए अग्नि से आहित अग्नि मिल जाय तो द्विज लोग (क्षामवां०) मन्त्र से होम करें। यदि दावाग्नि से अपने अग्नि का संसर्ग होजाय और उस से हृदय में दुःख हो तो भी उक्त मन्त्र से प्रायश्चित्त होम करे ॥ १४॥ दो बार करके संसर्ग हो तो अग्नि को शान्त कर देवे और संसर्ग न हुआ होय तो अग्नि को जगा लेवे ऐसा गिरिशर्मा ने कहा है ॥१५॥ अपने अग्नि में एक समिधा की आहुति को छोड़ के अन्य पुत्रादि निमित्त का भी होम न करे चाहे वे अन्य के होम स्वर्गवासार्थ भी हों तो भी अपने अग्नि में तब तक न करे कि जब तक पुत्र उत्पन्न न हो ॥ १६ ॥
नामकरण आदि संस्कारों में सब जगह लौकिक अग्नि लेना चाहिये क्यों कि पिता ने जिस अग्नि को स्थापित किया है वह कभी भी पुत्र का नहीं होता ॥ १७ ॥ जिस अग्निहोत्री के अग्नि में दूसरे मनुष्य का होम होजाय तो वह वैश्वानर देवता वाले चरु को बनाकर होम करे यही उसका प्रायश्चित्त है ॥ १८ ॥ अन्य कोई अपने लिये अग्निहोत्री के स्थापित अग्नि में होम करे