अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 290, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ४९
पितृयज्ञात्ययेचैव वैश्वदेवद्वयस्यच ॥ १९ ॥
अनिष्ट्वानवयज्ञेन नवान्नप्राशने तथा ।
भोजनेपतितान्नस्य चरुर्वैश्वानरोभवेत् ॥ २० ॥
स्वपितृभ्यःपितादद्यात् सुतसंस्कारकर्मसु ।
पिण्डानोद्वहनात्तेषां तस्याभावेतुतत्क्रमात् ॥ २१ ॥
भूतिप्रवाचनेपत्नी यद्यसन्निहिताभवेत् ।
रजोरोगादिनातत्र कथंकुर्वन्तियाज्ञिकाः ॥ २२ ॥
महानसेऽन्याकुर्यात् सवर्णांतांप्रवाचयेत् ।
प्रणवाद्यपिवाकुर्यात् कात्यायनवचोयथा ॥ २३ ॥
यज्ञवास्तुनिमुष्ट्यांच स्तंबेदर्भबटौतथा ।
दर्भसंख्यानविहिता विष्टरास्तरणेषुच ॥ २४ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ अष्टादशः खण्डः ॥ १८ ॥
वा अन्य के अग्नि में अग्निहोत्री स्वयं होम करे, पितृयज्ञ और दो बार वैश्वदेव के छूट जाने पर ॥१९॥ नवान्नेष्टि किये विना नया अन्न खा लेनेपर तथा पतित मनुष्य का अन्न भोजन करलेने पर इतने कर्मों में वैश्वानर चरु से प्रायश्चित्त होम करे ॥२०॥ पुत्रों के नामकरण आदि संस्कारों में पिता अपने पितरों को पिण्ड आदि देवे जब तक पुत्रों का विवाह न हो और विवाह हो जाने पर पुत्र भी मृत पितरों को पिण्ड देवें । पिता के मरजाने पर जो अधिकारी हो वही पिण्ड देवे ॥ २१ ॥ यदि भूतिप्रवाचन ( ऋत्विजों से आशीर्वाद आदि लेना ) में रजोधर्शन वा रोग आदि कारण पत्नी समीप में न होय तो यज्ञ करने वाले कैसा करें ? ॥२२॥ महानस ( रसोई खाने ) में जो स्त्री अन्न पकावे और वह अपनी सजातीय भी होय तो उसे भूतिप्रवाचन के समय पत्नी के स्थाना-पन्न करलेवे अथवा कात्यायन के कथनानुसार ओंकार आदि कर लेवे ॥ २३ ॥ यज्ञ के वास्तु ( घर ) में मुष्टी में यूपादिस्तंभ में दर्भ के बटु में और विष्टर के आस्तरण में कुशों की गिनती नहीं की जाती है ॥ २४ ॥
यह १८ खंड पूरा हुआ ॥