भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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५० कात्यायनस्मृतिः ॥

निःक्षिप्याग्निंस्वदारेषु परिकल्प्यर्त्विजंतथा । प्रवसेत्कार्य्यवान्विप्रो वृथैवनचिरंकचित् ॥ १ ॥ मनसानैत्यिकंकर्म्म प्रवसन्नप्यतन्द्रितः । उपविश्यशुचिःसर्वं यथाकालमनुव्रजेत् ॥२॥ पत्न्याचाप्यवियोगिन्या शुश्रूष्योऽग्निर्विनीतया । सौभाग्यवित्तावैधव्यकामयाभर्तृ भक्तया ॥३॥ यावास्याद्वीरसूरासामाज्ञासंपादिनीप्रिया । दक्षाप्रियंवदाशुद्धा तामत्रविनियोजयेत् ॥४॥ दिनत्रयेणवाकर्म्म यथाज्यैष्ठंस्वशक्तितः । विभज्यसहवाकुर्य्युर्यथाज्ञानंचशास्त्रवत् ॥५॥ स्त्रीणांसौभाग्यतोज्यैष्ठ्यं विद्ययैवद्विजन्मनाम् । नहिख्यात्यानतपसा भर्तातूष्यतियोषिताम् ॥६॥ भर्तुरादेशवर्त्तिन्या यथोमाबहुभिर्व्रतैः ।


अपनी स्त्री को अग्नि सौंप कर और एक ऋत्विज नियत करके कार्य्य वाला ब्राह्मण विदेश में जावे किन्तु चिरकाल तक कहीं व्यर्थ विदेश में भी नहीं ठहरे ॥१॥ विदेश में गया हुआ भी अग्निहोत्री स्नानादि करके बैठ कर अपने सब नित्य कर्म को आलस्य छोड़कर नियत समय पर मन से किया करे ॥ २ ॥ पति के वियोग को न चाहती हुई सौभाग्य, धन विधवा न होना इन की कामना के लिये पति में है भक्ति जिस की ऐसी पत्नी भी पति के विदेश जाने पर नम्र होकर अग्नि की सेवा करे ॥ ३ ॥ जिस के बहुत स्त्री हों वह पुरुष अग्नि की सेवा में उस स्त्री को नियुक्त करे जो वीरसू ( वीर पुत्र उत्पन्न करने वाली ) आज्ञाकारिणी प्यारी चतुर प्रियवचन कहने वाली-और शुद्ध हो॥४॥ अथवा सब स्त्रियां तीन दिन में बड़ी स्त्री के क्रम से अपनी शक्ति के अनुसार विभाग ( पारी २ से ) वा एक साथ मिल के अग्नि की सेवा करें अथवा जैसा शास्त्र का ज्ञान उन को हो वैसे सब करें ॥ ५ ॥ स्त्रियों का बड़प्पन सौभाग्यवती होने से है और ब्राह्मणों की बड़ाई विद्या से क्योंकि प्रसिद्धि और तप से स्त्रियों पर पति प्रसन्न नहीं होता ॥ ६ ॥ किन्तु पति की आज्ञा