अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 284, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ४३
दक्षिणांन्तंतदग्रैस्तु पित्र्ययज्ञेपरिस्तरेत् ॥ ४ ॥
स्थगरंसुरभिज्ञेयं चन्दनादिविलेपनम् ।
सौवीराञ्जनमित्युक्तं पिङ्गुलीनांयदञ्जनम् ॥ ५ ॥
स्वस्तरेसर्वमासाद्य यथावदुपयुज्यते ।
देवपूर्व्वंततःश्राद्धमत्वरःशुचिरारभेत् ॥ ६ ॥
आसनाद्यर्घपर्यन्तं वसिष्ठेनयथेरितम् ।
कृत्वाकर्मार्थपात्रेषु उक्तंदद्यात्तिलोदकम् ॥ ७ ॥
तूष्णींपृथगपोदत्वा मन्त्रेणतुतिलोदकम् ।
गन्धोदकंचदातव्यं सन्निकर्षक्रमेणतु ॥ ८ ॥
आसुरेणतुपात्रेण यस्तुदद्यात्तिलोदकम् ।
पितरस्तस्यनाश्नन्ति दशवर्षाणिपञ्च ॥ ९ ॥
कुलालचक्रनिष्पन्नमासुरंमृन्मयंस्मृतम् ।
तदेवहस्तघटितं स्थाल्यादिदैविकंभवेत् ॥ १० ॥
गन्धान्ब्राह्मणसात्कृत्वा पुष्पाण्युतुभवानिच ।
कुशों से कर्षू नाम उक्त तीनों रेखाओं का आच्छादन करे। और पितरों के श्राद्ध में दक्षिणा को है अग्रभाग जिनका ऐसे कुशों का परिस्तरण करे ॥ ४ ॥
सुगन्ध वाले चन्दन आदि के लेपन को स्थगर और पिङ्गुलियों के अञ्जन को सौवीराञ्जन कहते हैं ॥ ५ ॥ अच्छे कुशों के आसन पर सब वस्तुओं को यथोचित रख कर शीघ्रता न करके देवताओं का पूजन आदि पूर्वक शुद्ध होकर श्राद्ध का प्रारम्भ करे ॥ ६ ॥ आसन से लेकर अर्घ पर्यन्त कर्म वशिष्ठ जी ने जैसा कहा है उस प्रकार करके पात्र में पूर्वोक्त तिलोदक देवे ॥ ७ ॥ प्रथम मन्त्र के विना पृथक् २ जल देकर मन्त्र द्वारा तिल जल देवे और समीप के क्रम से फिर गन्धोदक देवे ॥ ८ ॥ आसुर पात्र से जो पुरुष तिलोदक देता है पन्द्रह वर्ष तक उसके यहां पितर नहीं खाते ॥ ९ ॥ कुलाल के चाक से जो मिट्टी का पात्र बनता है उसे आसुर (राक्षसों का) पात्र कहते हैं और वही मट्टी का पात्र स्थाली आदि हाथ से बनता है उसे दैविक (देवताओं का) पात्र कहते हैं ॥ १० ॥ गन्ध और ऋतु में पैदा हुये फूल और दूध ब्राह्मणों को क्रम से
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