भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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४२ कात्यायनस्मृतिः ॥

यथोक्तेनैवकल्पेन पुत्रिकायानचेत्सुतः ॥ २१ ॥ नयोषिद्भ्यःपृथग्दद्यादवसानदिनादृते । स्वभर्तृपिण्डमात्राभ्यस्तृप्तिरासांयतःस्मृता ॥ २२ ॥ मातुःप्रथमतःपिण्डं निर्वपेत्पुत्रिकासुतः । द्वितीयंतुपितुस्तस्यास्तृतीयंतुपितुःपितुः ॥ २३ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ षोडशः खण्डः ॥ १६ ॥ पुरतोयात्मनःकुर्युःसापूर्वापरिकीर्त्यते । मध्यमादक्षिणेनास्यास्तद्दक्षिणतउत्तमा ॥ १ ॥ वाय्वग्निदिङ्मुखान्तास्ताः कार्याःसार्द्धांगुलान्तराः । तीक्ष्णान्तायवमध्याश्च मध्यंनावद्वोत्किरेत् ॥ २ ॥ शंकुश्चखादिरःकार्यो रजतेनविभूषितः । शंकुश्चैवोपवेषश्च द्वादशाङ्गुलइष्यते ॥ ३ ॥ अग्न्याशाग्रैः कुशैःकार्यं कर्षूणांस्तरणंघनैः ।

संग शास्त्रोक्त विधि से करे यदि पुत्रिका (जो इस प्रतिज्ञा से बिवाही जाती है कि जो इस के लड़का हो सो मैं लूंगा) का पुत्र न हो ॥ २१ ॥ मरण के दिन से बिना स्त्रियों को पति से पृथक् (पिण्डादि) न देवे क्योंकि स्त्रियों की तृप्ति पति के पिंड के लेश से ही कही है ॥ २२ ॥ जो पुत्रिका का पुत्र है वह पहिला पिण्ड माता को दूसरा नाना को तीसरा परनाना को देवे ॥ २३ ॥

यह १६ खण्ड पूरा हुआ ॥

जो रेखा अपने सामने की जाती है उसे पूर्वा और पूर्वा से जो दक्षिण की तरफ की जाती है उसे मध्यमा—और मध्यमा से दक्षिण की तरफ हो उसे उत्तमा कहते हैं ॥ १ ॥ इन तीनों को ऐसे क्रम से करे जैसे वायव्य दिशा से आरम्भ करके आग्नेय दिशा में अग्र भाग हो और डेढ़ अंगुल का बीच रहे और इन तीनों का अग्रभाग पैना और बीच का भाग जौ के समान मोटा हो जैसा कि नाव का आकार होता है ॥ २ ॥ चांदी जिसमें लगी हो और खैर का हो ऐसा शंकु नाम (नाप करने को गाढ़ने की खूंटी) करना यह शंकु और उपवेष नाम हाथ के तुल्य पांच अंगुलि वाला यज्ञ पात्र ये दोनों बारह २ अंगुल के बनावे ॥ ३ ॥ अग्नि की दिशा में है अग्रभाग जिनका ऐसे