अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ३९
यवानांमिवगोधूमा व्रीहीणामिवशालयः ॥ २१ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ पञ्चदशः खण्डः ॥ १५ ॥
पिण्डान्वाहार्य्यकं श्राद्धं क्षीणेराजनिशस्यते ।
वासरस्यतृतीयांशे नातिसन्ध्यासमीपतः ॥ १ ॥
यदाचतुर्द्दशीयामं तुरीयमनुपूरयेत् ।
अमावास्याक्षीयमाणा तदैवश्राद्धमिष्यते ॥ २ ॥
यदुक्तंयदहस्त्वेव दर्शनंनैतिचन्द्रमाः ।
अनयापेक्षयाज्ञेयं क्षीणेराजनिचेत्यपि ॥ ३ ॥
यच्चोक्तंदृश्यमानेपितच्चतुर्द्दश्यपेक्षया ।
अमावास्यां प्रतीक्षेत तदन्तेर्वापनिर्वपेत् ॥ ४ ॥
अष्टमेंऽशेचतुर्द्दश्याः क्षीणोभवतिचन्द्रमाः ।
अमावास्याष्टमांशंच पुनःकिलभवेदणु ॥ ५ ॥
आग्रहायण्यमावस्या तथाज्यैष्ठस्ययाभवेत् ।
विशेषमाभ्यांब्रुवते चन्द्रचारविदो जनाः ॥ ६ ॥
अत्रेन्दुराय प्रहरेवतिष्ठते चतुर्थभागोनकलावशिष्टः ।
जौ के सदृश गेहूं हैं और व्रीहि (धान) के समान शालि (चावल सफेद) होते हैं ॥ २१ ॥ यह १५ वां खण्ड पूरा हुआ ॥
पिण्डान्वाहार्य्यक श्राद्ध (जो मावस को होता है) जिस दिन चन्द्रमा क्षीण हो तब करे तीसरे प्रहर में कुछ सन्ध्या काल के अति निकट न हो ऐसे अवसर में करना उत्तम होता है ॥ १ ॥ जब अमावस्था की हानि हो तो चतुर्दशी के चौथे प्रहर में श्राद्ध करना कहा है ॥ २ ॥ जो यह कहा है कि जिस दिन चन्द्रमा न दीखे उसी अपेक्षा से अमावस की हानि होने पर चतुर्दशी को श्राद्ध करे ॥ ३ ॥ और जो श्रुति में कहा है कि चन्द्रमा के दीखने पर भी श्राद्ध करे सो चतुर्दशी के अनुरोध से है परन्तु मावस की प्रतीक्षा करे अथवा चतुर्दशी के अन्त में पिण्ड देदेवे ॥ ४ ॥ चौदश के आठवें भाग में ही चन्द्रमा क्षीण होजाता है और अमावश्या के आठवें भाग में अणु (सूक्ष्म) रूप होता है ॥ ५ ॥ अगहन और जेठकी जो मावस हैं इन दोनों में चन्द्रमा की गति के जानने वाले कुछ विशेषता कहते हैं ॥ ६ ॥ इन दोनों मावसों के पहिले प्रहर में सोलहवें भाग से चतुर्थांश कम चन्द्रमा