अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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कात्यायनस्मृतिः ॥
तदन्तएवक्षयमेतिकृत्स्नमेवंज्योतिश्चक्रविदोवदन्ति ॥ ७ ॥
यस्मिन्नब्देद्वादशैकश्चत्रयव्यस्तस्मिंस्तृतीयायापरिदृश्योनोपजायते।
एवंचारंचन्द्रमसोविदित्वाक्षीणेतस्मिन्नपराण्हेचदद्यात् ॥ ८ ॥
सम्मिश्रायाचतुर्द्दश्याअमावस्याभवेत्क्वचित् ।
खर्व्विकांतांविदुःकेचिद्गताध्वामितिचापरे ॥ ९ ॥
वर्द्धमानाममावस्यां लभेच्चेदपरेहनि ।
यामांस्त्रीनधिकान्वापि पितृयज्ञस्ततोभवेत् ॥ १० ॥
पक्षादावेवकुर्वीत सदापक्षादिकंचरुम् ।
पूर्वाण्हएवकुर्व्वन्ति विद्धेऽप्यन्येमनीषिणः ॥ ११ ॥
सपितुःपितृकृत्येषु ह्यधिकारोनविद्यते ।
नजीवन्तमतिक्रम्य किंचिद्दद्यादितिश्रुतिः ॥ १२ ॥
पितामहेजीवतिच पितुःप्रेतस्यनिर्वपेत् ।
पितुस्तस्यचवृत्तस्य जीवेच्चेत्प्रपितामहः ॥ १३ ॥
पितुःपितुःपितुश्चैव तस्यापिपितुरेवच ।
रहता है फिर एक प्रहर के वाद सब क्षय होजाता है ऐसे ज्योतिष के ज्ञाता कहते हैं ॥ ७ ॥ जिस संवत् में तेरह महीने होते हैं उस में तीसरे पहर से पीछे चौदस को चन्द्रमा नहीं दीखे इस प्रकार चन्द्रमा की गति जानकर क्षीण चन्द्रमा के समय मध्यान्ह के पीछे पिण्ड देवे ॥ ८ ॥ यदि कभी चौदश से मिली मावस होय तो उसे कोई खर्व्विका और कोई गताध्वा कहते हैं ॥ ९ ॥ यदि अगले दिन तीन पहर वा अधिक मावस मिले तो उस दिन पितृ यज्ञ ( श्राद्ध ) होता है ॥ १० ॥ पक्ष याग का चरु पक्ष की आदि (१में) तिथि के विद्ध होने भी मध्यान्ह से पूर्व ही करे यह कोई कहते हैं ॥ ११ ॥ जिस का पिता जीवित हो उसको पितृ कर्म में श्राद्ध का अधिकार नहीं है क्योंकि जीते हुए का उलंघन करके अर्थात् जीवते पिता को छोड़ के पितामहादि को कुछ न देवे यह वेद में लिखा है ॥ १२ ॥ पिता-पितामह-प्रपिता मह इन तीनों को ३ पिण्ड देवे । यदि पिता मर गया हो और पितामह जीवित हो तो मरे पिताको पिण्ड देवे । यदि प्रपितामह जीवित हो तथा पिता पितामह दोनों मर गये हों ॥ १३ ॥ तो वृद्ध प्रपितामह ( बूढा परबाबा )