भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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३८ कात्यायनस्मृतिः ॥

दर्वीद्व्यंगुलपृथ्वग्रा तुरीयोनान्तुमेक्षणम् ॥ १५ ॥
मुसलोलूखलेवार्क्षे स्वायत्तेसुदृढेतथा ।
इच्छाप्रमाणेभवतः शूर्पं वैणवमेवच ॥ १६ ॥
दक्षिणंवामतोबाह्यमात्माभिमुखमेवच ।
करंकरस्यकुर्वीत करणेन्यञ्चकर्मणः ॥ १७ ॥
कृत्वाग्न्यभिमुखौपाणी स्वस्थानस्थौसुसंयतौ ।
प्रदक्षिणं तथासीनः कुर्यात्परिसमूहनम् ॥ १८ ॥
बाहुमात्राःपरिधय ऋजवःसत्वचोऽव्रणाः ।
त्रयोभवन्तिशीर्णाग्रा एकेषान्तुचतुर्दिशम् ॥ १९ ॥
प्रागग्रावलिभिःपश्चादुदगग्रमथापरम् ।
न्यसेत्परिधिमन्यंचेदुदगग्रमथपूर्वतः ॥ २० ॥
यथोक्तवस्तुसंपत्तौग्राह्यं तदनुकारयेत् ।


दर्वि कहते हैं। इस में जो विशेषता है उसे हम कहते हैं दर्वि का दो अंगुल मोटा अग्रभाग होता है मेक्षण उस में आधा अंगुल मुटाई में कम होता है ॥१५॥
मुसल और ऊखल काठ के होते हैं अच्छे चौड़े-और दृढ़ और अपनी इच्छा नुसार प्रमाण वाले बनावे और सूप बांस का होता है ॥ १६ ॥ नीचे को कोई काम करना हो तो प्रथम दहिने हाथ को अपने सम्मुख औंधा रक्खे और बांयां हाथ उस से ऊपर औंधा रक्खे ॥ १७ ॥ अग्नि के सन्मुख दोनों हाथ आगे दहिना पीछे वांयां सम्यक् तत्पर करके प्रदक्षिण क्रम से परिसमूहन करें ॥ १८ ॥ भुजा की बराबर लम्बी-कोमल-बक्कल सहित-जो घुनी न हो आगे से फटी तीनपरिधि होती हैं किन्हीं ऋषियों के मत में चारो दिशाओं में चार होती हैं ॥ १९ ॥
तीन परिधि रखने के पक्ष में अग्नि कुण्ड की उत्तर दक्षिण मेखलाओं पर दो परिधि पूर्व को अग्रभाग करके घरे तथा पश्चिम मेखला पर उत्तराग्र धरे । यदि चौथी रक्खे तो पूर्वकी मेखला पर उत्तराग्र धरे । वा पूर्व में खाली रक्खे ॥२०॥
यदि शास्त्र में कही हुई वस्तु न मिले तो उस के सदृश को ग्रहण करे

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