अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 278, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ३७
गुणान्वितायदातव्यं नास्तिमूर्खेव्यतिक्रमः ॥ ८ ॥ ब्राह्मणातिक्रमोनास्ति विप्रेवेदविवर्जिते । ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य नहिभस्मनिहूयते ॥ ९ ॥ आज्यस्थालीचकत्र्त्तव्या तैजसद्रव्यसंभवा । महीमयीवाकर्त्तव्या सर्वास्याज्याहुतीषुच ॥ १० ॥ आज्यस्थाल्याःप्रमाणंतु यथाकामन्तुकारयेत् । सुदृढामव्रणांभद्रामाज्यस्थालींप्रचक्षते ॥ ११ ॥ तिर्यगूद्ध्र्वं समिन्मात्रा दृढानातिबृहन्मुखी । मृन्मय्यौदुम्बरीवापि चरुस्थालीप्रशस्यते ॥ १२ ॥ स्वशाखोक्तःप्रसुस्विन्नो ह्यदग्धोऽकठिनःशुभः । नचातिशिथिलःपाच्यो नचरुञ्चारसस्तथा ॥ १३ ॥ इध्मजातीयमिध्मार्थं प्रमाणंमेक्षणंभवेत् । वृत्तं चाङ्गुष्ठपृथ्वग्रमवदानक्रियाक्षमम् ॥ १४ ॥ एषैवदर्वीस्तत्र विशेषस्तमहंब्रुवे ।
माना जायगा ॥ ८ ॥ वेद से रहित ब्राह्मण का उलंघन नहीं है क्योंकि जलते हुए अग्नि को छोड़कर भस्म में आहुति नहीं दी जाती है ॥ ९ ॥
घी की सब आहुतियों में सोने चांदी कांसा तांबादि की वा मिट्टी की आज्यस्थाली ( घी का पात्र ) बनाना चाहिये ॥ १० ॥ आज्यस्थाली का प्रमाण अपनी इच्छा के अनुसार रक्खे परन्तु छिद्र रहित दृढ दर्शनीय पात्र को ही विद्वान् लोग आज्यस्थाली कहते हैं ॥ ११ ॥ जो तिरछी और ऊंची समिधा की बराबर दृढ हो और अधिक चौड़ा जिसका मुख न हो ऐसी चरुस्थाली ( भात पकाने का पात्र ) श्रेष्ठ होता है ॥ १२ ॥ जो अपनी शाखा में कहा हो जिसमें जल न टपके जला न हो—कड़ा न हो— सुन्दर हो—बहुत गला न हो—रस वाला हो ऐसे चरु को पकावे ॥ १३ ॥ जिस काठ का इध्म हो उसी काठ का और इध्म का आधा प्रमाण लम्बा—और गोल—और अंगूठा के समान जिसका अग्रभाग मोटा हो और जो चरु के लेने में समर्थ हो ऐसा मेक्षण होता है ॥ १४ ॥ इसी को