अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकात्यायनस्मृतिः ॥ २५
धनुःसहस्राण्यष्टौतु गतिर्यासांनविद्यते ।
नतानदीशब्दवहा गर्त्तास्ताःपरिकीर्त्तिताः ॥ ६ ॥
उपाकर्मणिचोत्सर्गे प्रेतस्नानेतथैवच ।
चन्द्रसूर्यग्रहेचैव रजोदोषोनविद्यते ॥७॥
वेदाश्छन्दांसिसर्वाणि ब्रह्माद्याश्चदिवौकसः ।
जलार्थिनोऽथपितरो मरीच्याद्यास्तथर्षयः ॥८॥
उपाकर्मणिचोत्सर्गे स्नानार्थंब्रह्मवादिनः ।
पिपासूननुगच्छन्ति सन्तुष्टाःस्वशरीरिणः ॥६॥
समागमस्तुयत्रैषां तत्रहत्यादयोमन्नाः ।
नूनंसर्वेक्षयंयान्ति किमुतैकंनदीरजः ॥१०॥
ऋषीणांसिच्यमानाना-मन्तरालंसमाश्रितः ।
सम्पिबेद्यःशरीरेण पर्षन्मुक्तजलच्छटाः । ११॥
विद्यादीन्ब्राह्मणःकामान्वरादीन्कन्यकाऽऽप्नुयात् ।
आठ हजार धनुष तक जो नहीं जातीं उन को नदी नहीं कहते किन्तु उनका नाम गर्त है ॥६॥ उपाकर्म नाम श्रावणी के दिन होने वाला वेदारम्भ और उत्सर्ग नाम वेद समाप्ति का स्नान प्रेत के निमित्त स्नान चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण का स्नान इन में नदी के रजस्वला होने का दोष नहीं है ॥७॥ वेद, संपूर्ण छंद ब्रह्मादिक देवता और जल के अभिलाषी पितर और मरीचि आदि ऋषी ॥ ८ ॥ ये सब अपना २ सूक्ष्म शरीर धारण कर उस समय उन के पीछे चलते हैं जिस समय सन्तोषी वेद के ज्ञाता देहधारी उपाकर्म और उत्सर्ग के स्नान के निमित्त जाते हैं ॥ ९ ॥ जहां इन वेद आदिकों का समागम है वहां जब हत्या आदि बड़े २ सब पाप निश्चय से नष्ट हो जाते हैं तब नदी का रज नष्ट क्यों न होगा?॥१०॥ सींचे जाते ( हुए ) ऋषियों के मध्य में ठहरा जो मनुष्य अपने शरीर के द्वारा शिष्य समुदाय से छुट्टी जल की छटाओं ( बूंदों ) को पीता है अर्थात् ऋषि आदि के तर्पणो गङ्ग के छींटें अपने शरीर पर लेता है ॥ ११ ॥