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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

संवर्त्तस्मृतिः ॥ ३१

चांडालेसंकरेविप्रः श्वपाकेपुल्कसेपिवा । गोमूत्रयावकाहारो मासाद्धेर्नविशुद्ध्यति ॥२ १॥ पतितेनतुसंसर्गं मासमासार्द्धमेववा । गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥२०२॥ पतिताद्द्रव्यमादत्ते भुंक्ते वाब्राह्मणोयदि । कृत्वातस्यसमुत्सर्ग-मतिकृच्छ्रं चरेद्द्विजः ॥ २०३ ॥ यत्रयत्रचसंकीर्ण मात्मानंमन्यतेद्विजः । तत्रतत्रतिलैर्होमो गायत्र्याप्रत्यहंद्विजः ॥ २०४ ॥ एषएवमयाप्रोक्तः प्रायश्चित्तविधिःशुभः अनादिष्टेषुपापेषु प्रायश्चित्तंनचोच्यते ॥ २०५ ॥ दानैर्होमैर्जपैर्नित्यं प्राणायामैर्द्विजोत्तमः । पातकेभ्यःप्रमुच्येत वेदाभ्यासान्नसंशयः ॥२०६॥ सुवर्णदानंगोदानं भूमिदानंतथैवच । नाशयन्त्याशुपापानि ह्यन्यजन्मकृतान्यपि ॥२०७॥


चांडाल-वर्णसंकर-श्वपाक-और पुल्कस इन के भोजन को खाकर पंद्रह दिन में शुद्ध होता है ॥ २०१ ॥ एक मास अथवा पंद्रह दिन पतित का संसर्ग (मेल) करे तो गोमूत्र और जौं का खाकर पंद्रह दिन में शुद्ध होता है ॥ २०२ ॥ जो ब्राह्मण पतित के द्रव्य को ग्रहण करता है अथवा खाता है वह उस अन्न का त्याग ( वमन ) करके अतिकृच्छ्र व्रत करे ॥ २०३ ॥ जिस २ कर्म में द्विज अपने को संकीर्ण (पतित) समझे उसी २ कर्म में गायत्री मन्त्र से तिलों का प्रतिदिन होम करे ॥२०४॥ यह हमने प्रायश्चित्त का श्रेष्ठ विधान कहा और जो पाप अनादिष्ट (शास्त्र में नहीं कहे) हैं उनका प्रायश्चित्त भी नहीं कहा है॥२०५॥ दान होम जप-प्राणायाम-और वेद पाठ-इनके करने से ब्राह्मण सदैव उन पाप से मुक्त होता है ॥२०६॥ सोना-गौ और पृथ्वी इनका दान अन्य जन्म के किये हुये पापों को भी शीघ्र नष्ट कर देता है ॥ २०७॥

३२ पाराशर्यसंहिता ॥

तिलंधेनुंचयोदद्या-त्संयतायद्विजातये । ब्रह्महत्यादिभिःपापै-र्मुच्यतेनात्रसंशयः ॥ २०८ ॥ माघमासेतुसंप्राप्ते पौर्णमास्यामुपोषितः । ब्राह्मणेभ्यस्तिलान्दत्वा सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥२०९॥ उपवासीनरोभूत्वा पौर्णमास्यांतुकार्तिके । हिरण्यंवस्त्रमन्नंच दत्वातरतिदुष्कृतम् ॥२१०॥ अयनेविषुवेचैव व्यतीपातेदिनक्षये । चन्द्रसूर्यग्रहेचैव दत्तंभवतिचाक्षयम् ॥ २११ ॥ अमावास्याचद्वादश्यां संक्रांतौचविशेषतः । एताःप्रशस्तास्तित्थयो भानुवारस्तथैवच ॥२१२॥ तत्रस्नानंजपोहोमो ब्राह्मणानांचभोजनम् । उपवासस्तथादान-मेकैकंपावयेन्नरम् ॥ २१३ ॥ स्नातःशुचिर्धौतवासाः शुद्धात्माविजितेन्द्रियः ।


जो जितेन्द्रिय ब्राह्मण को तिल तथा गौ को देता है वह ब्रह्महत्या आदि पापों से निर्मुक्त हो जाता है इस में संशय नहीं है ॥२०८॥ माघ महीने की पूर्णमासी को उपवास करके जो तिलों का दान ब्राह्मणों को देता है वह सब पापों से मुक्त होजाता है ॥ २०९ ॥ कार्तिक की पूर्णमासी को उपवास करके सोना-वस्त्र और अन्न इन का दान देकर पापसागर से तरजाता है॥२१०॥ दक्षिणायन, उत्तरायण-विषुव(तुल मेष)की संक्रान्ति, व्यतिपात योग-तिथि की हानि, चन्द्र और सूर्य के ग्रहण-में दिया हुआ दान अक्षय होता है ॥ २११ ॥ अमावस, द्वादशी, संक्रान्ति विशेष कर ये तिथौ और रविवार ये दान के लिये बहुत श्रेष्ठ हैं॥ २१२॥ इन में किये हुये स्नान, जप, होम और ब्राह्मणों को भोजन उपवास तथा दान प्रत्येक मनुष्य को पवित्र करते हैं ॥ २१३ ॥ स्नान करके तथा शुद्ध होकर धुले हुये श्वेत वस्त्र धारणकर शुद्ध मन हो इन्द्रियों को जीत कर और

संवर्त्तस्मृतिः ॥ ३३

सात्त्विकंभावमास्थाय दानंदद्याद्विचक्षणः ॥२१४ ॥ सप्तव्याहृतिभिःकार्यो द्विजैर्होमो जितात्मभिः । उपपातकशुद्ध्यर्थं सहस्रंपरिसंख्यया ॥२१५॥ महापातकसंयुक्तो लक्षहोमंसदाद्विजः । मुच्यतेसर्वपापेभ्यो गायत्र्याचैवपावितः ॥ २१६ ॥ अभ्यसेत्सतथापुण्यां गायत्रींवेदमातरम् । गत्वाऽरण्येनदीतीरे सर्वपापविशुद्धये ॥ २१७ ॥ स्नात्वाचविधिवत्तत्र प्राणानायम्यवाग्यतः । प्राणायामैस्त्रिभिःपूतो गायत्रींतुजपेद्विजः ॥२१८॥ अक्लिन्नवासाःस्थलगः शुचौदेशे समाहितः । पवित्रपाणिराचान्तो गायत्र्याजपमारभेत् ॥२१९॥ ऐहिकामुष्मिकंपापं सर्वंनिरवशेषतः । पञ्चरात्रेणगायत्रीं जपमानोव्यपोहति ॥२२०॥ गायत्र्यास्तुपरंनास्ति शोधनंपापकर्मणाम् ।


सात्त्विकस्वभाव ( सुशील ) होकर ज्ञानवान् पुरुष दानदे ॥ २१४ ॥ मन को जीतने वाले द्विज लोग उपपातकों की शुद्धि के अर्थ सात व्याहृतियों से एक हजार आहुति होम करें ॥२१५ ॥ तथा महापातकी गायत्री से लक्ष ( लाख ) आहुति होम करे क्योंकि गायत्री से पवित्र किया ब्राह्मण सब पापों से मुक्त होजाता है ॥२१६॥ सर्वपापों की शुद्धि के लिये वेदों की माता पवित्र गायत्री का वन में जाकर वा नदी के तट पर जप करे । २१७॥ नदी तालाब आदि में विधिपूर्वक स्नान तथा आचमन करके तीन प्राणायामों से पवित्र हुआ द्विज गायत्री का जप करे ॥२१८॥ क्लिन्न (गीले) वस्त्र न पहनकर शुद्ध स्थान पर स्थल में बैठ के सावधान होकर कुशाओं की पवित्री धारण कर आचमन के पश्चात् गायत्री के जप का आरम्भ करे ॥२१९॥ पांच दिन तक गायत्री का जप करता हुआ, पुरुष इस जन्म और अन्य जन्म के संपूर्ण पापों को नष्ट करता है ॥२२०॥ पापियों को शुद्ध करने वाला गायत्री से परे अन्य उपाय नहीं है महाव्याहृति और

३४ भाषार्थसहिता ॥

महाव्याहृतिसंयुक्तां प्रणवेनचसंजपेत् ॥२२१॥ ब्रह्मचारीनिराहारः सर्वभूतहितेरतः । गायत्र्यालक्षजप्येन सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥२२२॥ अयाज्ययाजनंकृत्वा भुक्त्वाचान्नंविगर्हितम् । गायत्र्यष्टसहस्रंतु जपंकृत्वाविशुद्ध्यति ॥२२३॥ अहन्यहनियोधीते गायत्रींवेदद्विजोत्तमः । मासेनमुच्यतेपापा-त्पन्नगःकंचुकाद्यथा ॥२२४॥ गायत्रींयस्तुविप्रोवै जपेन्नियतस्सदा । सयातिपरमंस्थानं वायुभूतःखमूर्तिमान् ॥२२५॥ प्रणवेनचसंयुक्ता व्याहृतीःसप्तनित्यशः । गायत्रींशिरसासाद्धं मनसात्रिःपठेद्द्विजः ॥२२६॥ निगृह्यचात्मनःप्राणा-न्प्राणायामोविधीयते । प्राणायामत्रयं कुर्या-न्नित्यमेवसमाहितः ॥२२७॥ मानसंवाचिकंपापं कायेनैवचयत्कृतम् ।


ोंकार सहित गायत्री का जप करे ॥ २२१ ॥ ब्रह्मचारी भोजन को छोड़ कर सब के कल्याण में तत्पर हुआ एक लाख गायत्री का जप कर ने से सब पापों से मुक्त होता है ॥ २२२ ॥ यज्ञ कराने के अयोग्य पुरुष के यहां यज्ञ कराकर और निन्दित अन्न को खाकर आठ हजार गायत्री का जप करने से शुद्ध होता है ॥ २२३ ॥ जो ब्राह्मण प्रतिदिन गायत्री का जप करता है वह पाप से इस प्रकार छूटता है जैसे कांचली से सांप ॥२२४॥ जो ब्राह्मण इन्द्रियों को वश में करके सदा गायत्री का जप करता है वह वायु और आकाश रूप होकर उत्तम स्थान को प्राप्त होता है ॥२२५॥ ओंकार सहित सातव्याहृति और (आपोज्योती०) इस शीर्ष मन्त्र सहित गायत्री अर्थात् प्राणायाम को द्विज तीन बार नित्य करे ॥२२६॥ प्राणों को वश में करने को प्राणायाम कहते हैं सावधान हो कर प्रतिदिन तीन प्राणायाम करे ॥२२७॥ मन वाणी देह से किया जो पाप

संवर्त्तस्मृतिः ॥ ३५

तत्सर्वंनाशमायाति प्राणायामप्रभावतः ॥२२८॥ ऋग्वेद मभ्यसेद्यस्तु यजुःशाखामथापिवा । सामानिसरहस्यानि सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥२२९॥ पावमानींतथाकौत्सीं पुरुषंसूक्तमेवच । जप्त्वापापैःप्रमुच्येत सपित्र्यंमाधुच्छंदसम् ॥२३०॥ मंडलंब्राह्मणंरुद्र सूक्तोक्तांश्चबृहत्कथाः । वामदेव्यंबृहत्साम जप्त्वापापैःप्रमुच्यते ॥ २३१ ॥ चांद्रायणंतुसर्वेषां पापानांपावनंपरम् । कृत्वाशुद्धिमवाप्नोति परमंस्थानमेवच ॥२३२॥ धर्मशास्त्रमिदंपुण्यं संवर्त्तेनतुभाषितम् । अधीत्यब्राह्मणोगच्छेद्व्रह्मणःसद्मशाश्वतम् ॥२३३॥ इति संवर्त्तप्रणीतं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥

वह सब प्राणायाम के प्रभाव से नष्ट हो जाता है ॥ २२८ ॥ ऋग्वेद यजुर्वेद की शाखा और उपनिषद् भाग सहित सामवेद इन का अभ्यास (पाठ) करके मनुष्य सब पापों से मुक्त होता है ॥ २२९ ॥ ऋग्वेद के नवम मण्डल के आरम्भ के पवमान सूक्त हैं उन पावमानी, कुत्सऋषि वाले (अपनः शोशुचदघ०) इत्यादि । ऋ० १।९।५ सूक्त (सहस्र शीर्षा०) इत्यादि पुरुष सूक्त पितृ देवता तथा मधुछन्दो ऋषि वाले मंत्र इनको जप कर सब पापों से छूटता है ॥ २३० ॥ मण्डल ब्राह्मण ( शतपथ कां० १०। अ ५। ब्रा०२ रुद्र सूक्त के विस्तृत कथन, वामदेव्य साम और बृहत्साम वेद इनको जप के भी पापों से छूटता है ॥ २३१ ॥ परन्तु सब प्रायश्चित्तों में चान्द्रायण व्रत परम उत्तम है उसको करके शुद्ध हुआ उत्तम लोक को प्राप्त होता है ॥ २३२ ॥ संवर्त्त ऋषि के कहे इस पवित्र धर्म शास्त्र को ब्राह्मण पढ़ और जान तदनुसार चलकर सनातन ब्रह्मलोक में जाता है ॥ २३३ ॥

इति संवर्त प्रणीतं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥ ८ ॥

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श्रीगणेशायनमः

कात्यायनस्मृतिप्रारम्भः

अथातो गोभिलोक्तानामन्येषांचैवकर्मणाम् ।
अस्पष्टानांविधिंसम्य-ग्दर्शयिष्येप्रदीपवत् ॥ १ ॥

त्रिवृदूर्ध्ववृतंकार्यं तंतुत्रयमधोवृतम् ।
त्रिवृतंचोपवीतं स्यात्तस्यैको ग्रन्थिरिष्यते ॥ २ ॥

पृष्ठवंशेचनाभ्यांच धृतंयद्विन्दतेकटीम् ।
तद्धार्यमुपवीतं स्यान्नातिलंबंनचोच्छ्रितम् ॥ ३ ॥

सदोपवीतिनाभाव्यं सदावद्धशिखेनच ।
विशिखोऽनुपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम् ॥ ४ ॥

त्रिःप्राश्यापोद्विरुन्मृज्य मुखमेतान्युपस्पृशेत् ।
आस्यनासक्षिकर्णांश्च नाभिवक्षःशिरोंसकान् ॥ ५ ॥

संहताभिस्त्र्यंगुलिभि-रास्यमेवमुपस्पृशेत् ।
अंगुष्ठेनप्रदेशिन्या घ्राणंचैवमुपस्पृशेत् ॥ ६ ॥

अंगुष्ठानामिकाभ्यांच चक्षुःश्रोत्रंपुनःपुनः ।


इसके अनंतर गोभिल ऋषि के कहे तथा अन्य ऋषियों के कल्पोक्त कर्मों की विधि दीपक के समान भली प्रकार दिखाते हैं ॥ १ ॥ त्रिवृत् तीन तार एक सूत के ऊपर को वटे और फिर वे तीनों त्रिवृत् [ तिगुने ] नीचे को वटे ऐसा त्रिवृत् उपवीत ( जनेऊ ) होता है उसकी एक ग्रन्थि ( गांठ ) कही है ॥ २ ॥ पीठ की हड्डी और नाभि पर से धारण किया जो कटि तक आजाय उस जनेऊ को धारे किन्तु न बहुत लंबा हो और न बहुत छोटा ॥ ३ ॥

सदैव जनेऊ पहने और शिखा में गांठ सदैव लगाये जिस के शिखा में गांठ और जनेऊ नहीं वह जो काम करता है वह न किये के समान है ॥ ४ ॥

सब कर्मों में प्रथम तीन बार जल पीके दो बार मुख पूंछ कर मुख नासिका नेत्र कान नाभि हृदय शिर और कंधे इन का स्पर्श करे ॥ ५ ॥

मिली हुई बीच की तीन अंगुलियों से मुख का, अंगूठा और प्रदेशिनी ( कानी ) से घ्राण नासिका का स्पर्श करे ॥ ६ ॥ अंगूठा और अनामिका अंगुली

भाषार्थसंहिता ॥

कनिष्ठांगुष्ठयोर्नाभिं हृदयन्तुतलेनवै ॥७॥
सर्वाभिस्तुशिरःपश्चा-द्वाहूचाग्रेणसंस्पृशेत् ।
यत्रोपदिश्यतेकर्म कर्तुरंगंनतूच्यते ॥८॥
दक्षिणस्तत्रविज्ञेयः कर्मणांपारगःकरः ।
यत्रदिङ्नियमोनस्या-ज्जपहोमादिकर्म्मसु ॥९॥
तिस्रस्तत्रदिशःप्रोक्ता ऐन्द्रीसौम्यापराजिताः ।
तिष्ठन्नासीनःप्रह्वोवा नियमोयत्रनेदृशः ॥१०॥
तदासीनेनकर्त्तव्यं नप्रह्वेणनतिष्ठता ।
गौरीपद्माशचीमेधा सावित्रीविजयाजया ॥११॥
देवसेनास्वधास्वाहा मातरोलोकमातरः ।
धृतिःपुष्टिस्तथातुष्टि-रात्मदेवतयासह ॥१२॥
गणेशेनाधिकाह्येता वृद्धौपूज्याश्चतुर्दश ।
कर्म्मादिषुतुसर्वेषु मातरःसगणाधिपाः ॥१३॥


से नेत्र और कानों का स्पर्श करे पहिले दहिने फिर बाँयें का कनिष्ठा (छिंगुनी) और अंगूठे से नाभि का, और हाथ तल से हृदय का स्पर्श करे ॥७॥
पीछे सब अंगुलियों से शिर का और हाथ के अग्रभाग से भुजाओं का स्पर्श करे । जहां शास्त्र में कर्म करना कहा हो और करने वाले का कोई अंग [अवयव] न कहा हो कि इस अंग से करे ॥८॥ तो वहां दहिना हाथ जो कर्मों को पूर्ण करता है जानना । जहां जप होम आदि कर्मों में दिशा का नियम न हो ॥९॥ तो वहां तीन दिशा कहीं जानो पूर्व, उत्तर, ईशान । जहां शास्त्र में यह नियम नहीं किया कि अमुक कर्म को खड़ा होके वा बैठ कर अथवा झुका हुआ करे ॥१०॥ उस कर्म को बैठकर करना चाहिये किन्तु खड़ा होकर वा झुक कर न करे । गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया जया॥११॥
देवसेना, स्वधा, स्वाहा, धृति, पुष्टि, तुष्टि, और आत्म देवता ॥१२॥ गणेश है अधिक जिन में ऐसी ये सब लोगों की माता चौदह मातृ का कहाती हैं वृद्धि श्राद्ध (नांदीमुख जो पुत्र जनमादि के समय किया जाता है) में इन १४ माताओं का पूजन करे अर्थात् गणेश जी सहित इन मातृकाओं का सब कर्मों की आदि में ॥१३॥

कात्यायनस्मृतिः ॥ ३

पूजनीयाःप्रयत्नेन पूजिताःपूजयन्तिताः । प्रतिमासुचशुभ्रासु लिखित्वावापटादिषु ॥१४॥ अपिवाक्षतपुंजेषु नैवेद्यैश्चपृथग्विधैः । कुड्यलग्नांवसोर्द्धारां सप्तधारांघृतेनतु ॥१५॥ कारयेत्पञ्चधारांवा नातिनीचांनोच्छ्रिताम् । आयुष्याणिचशान्त्यर्थं जप्त्वातत्रसमाहितः ॥१६॥ षड्भ्यःपितृभ्यस्तदनुभक्त्याश्राद्धमुपक्रमेत् । अनिष्ट्वातुपितॄञ्श्राद्धे नकुर्यात्कर्मवैदिकम् ॥१७॥ तत्रापिमातरःपूर्व्वं पूजनीयाःप्रयत्नतः । वशिष्टोक्तोविधिःकृत्स्नो द्रष्टव्योऽत्रनिरामिषः ॥१८॥ अतःपरंप्रवक्ष्यामिविशेषइहयोभवेत् ॥१९॥ इति श्रीकात्यायनस्मृतौ प्रथमखंडः समाप्तः ॥१॥ प्रातरामंत्रितान्विप्रान्युग्मानुभयतस्तथा । उपवेश्यकुशान्दद्यादृजुर्नैर्वाहिकपाणिना ॥१॥


यत्न से पूजन करे क्योंकि पूजा को प्राप्त हुई ये पूजनेवाले को पुजवाती हैं इन की सफेद मूर्त्तियों में अथवा पट्टे पर लिख कर ॥१४॥ अथवा अक्षतों के पुंजों की (ढेरी) में पृथक् २ नैवेद्यो से पूजे । और घी छोड़कर भीतमें सात वसोर्धारा बनावे ॥१५॥ वा पांच धारा करवावे और वे धारा न बहुत नीची हों न ऊंची और शांति के लिये अवश्यो बढ़ने की प्रार्थना अर्थ वाले मंत्र सावधानी से जप कर ॥१६॥ तिस पीछे छः पितरों के नान्दी श्राद्ध का भक्ति से प्रारम्भ करे। श्राद्ध में पितरों के बिना पूजे वेदोक्त कर्म न करे ॥१७॥ वहां भी यत्न से-माता [षोडश मातृका] सब से पहिले पूजनी चाहिये और इस श्राद्ध में वशिष्ठ ऋषिका कहा सब विधान देखना चाहिये ॥ १८ ॥ इस से आगे श्राद्ध विषय में जो विशेष वक्तव्य है सो हम कहेंगे ॥

यह प्रथम खंड समाप्त हुआ ॥

प्रातःकाल दिया है निमन्त्रण जिन को ऐसे दो २ ब्राह्मण दोनों पक्ष (माता और पिता) के बैठाकर धीरज के साथ हाथ से कुशाओं को देवे ॥१॥

भाषार्थसहिता ॥

हरितायज्ञियादर्भाः पीतकापाकयज्ञियाः ।
समूलाःपितृदैवत्याः कल्माषावैश्वदेविकाः ॥२॥
हरिताश्चैसपिञ्जल्याः शुष्काः स्निग्धाःसमाहिताः ।
रत्निमात्रप्रमाणेेन पितृतीर्थेनसंस्तृताः ॥३॥
पिण्डार्थंयेस्मृतादर्भास्तर्पणार्थंतथैवच ।
धृतैःकृतेचविण्मूत्रे त्यागस्तेषांविधीयते ॥४॥
दक्षिणांपातयेज्जानुं देवान्परिचरन्सदा ।
पातयेदितरंजानुं पितॄन्परिचरन्नपि ॥५॥
निपातोन्हिसव्यस्य जानुनोविद्यतेक्वचित् ।
सदापरिचरेद्भक्त्यापितॄनप्यत्रदेववत् ॥६॥
पितृभ्यइतिदत्तेषूपवेश्यकुशेषुतान् ।
गोत्रनामभिरामंत्रीय पितॄनर्घ्यंप्रदापयेत् ॥७॥
नात्रापसव्यकरणं नपित्र्यंतीर्थमिष्यते ।


यज्ञ के दाभ हरे और पाकयज्ञ नाम वैश्वदेवादि के पीले पितृ देवताओं के लिये जड़ सहित—और विश्वे देवताओं के लिये चित कबरे रंग के ॥२॥ पितृ श्राद्ध में हरे कुश हों वा सूखे हों पर वे अन्तर्गर्भित (जिन के भीतर से न निकाले हों) ऐसे चिकने बराबर करके रक्खे हाथ भर लम्बे लेकर पितृ तीर्थ से पितृब्राह्मणों के बैठने को बिछावे ॥३॥ पिंड और तर्पण के लिये भी पूर्वोक्त प्रकार के दाभ बिछाने चाहिये । यदि दाभों को हाथ में लिये हुए मल मूत्र त्याग करे तो उन कुशाओं को त्याग देवे ॥४॥ देवताओं की पूजा करता हुआ मनुष्य दहिने गोड़ेको और पितरों को पूजता हुआ बायें गोड़े को नवावे ॥५॥ बायें गोड़े का नवाना इस नान्दीमुख श्राद्ध में कहीं भी नहीं कहा है किन्तु दहिने गोड़े को नवा कर पितरों का देवताओं के समान पूजन करे ॥ ६ ॥ पितृभ्य इदं कुशासनंस्वधा-इस मन्त्र से बिछाये कुशाओं पर उन पितृ ब्राह्म-णों को बैठा कर और नाम और गोत्र से बुलाकर पितरों को अर्घ देवे ॥७॥ श्राद्धां के पूरण आदि कर्म देवतीर्थ से ही करे इस से इस आभ्युदयिक श्राद्ध

कात्यायनस्मृतिः ॥ ५

पात्राणांपूरणादीनि दैवेनैवहिकारयेत् ॥ ८ ॥ ज्येष्ठोत्तरकरान्युग्मान्कराग्राग्रपवित्रकान् । कृत्वाघ्यंसं प्रदातव्यं नैकैकस्यात्रदीयते ॥ ९ ॥ अनन्तर्गर्भिणंसाग्रं कौशंद्विदलमेवच । प्रादेशमात्रंविज्ञेयं पवित्रं यत्रकुत्रचित् ॥ १० ॥ एतदेवहिपिंजल्या लक्षणंसमुदाहृतम् । आज्यस्योत्पवनार्थं-तदप्येतावदेवतु॥ ११ ॥ एतत्प्रमाणमेवैके-कौशीमेवार्द्रमंजरीम् । शुष्कांवाशीर्णकुसुमां पिंजलींपरिचक्षते ॥ १२ ॥ पित्र्यंमंत्रानुद्रवणआत्मालंभेऽधमेक्षणे । अधोवायुसमुत्सर्गे प्रहासेऽनृतभाषणे ॥ १३ ॥ मार्जारमूषकस्पर्शे आक्रुष्टेक्रोधसंभवे ।


से अपसव्य करना और पितृतीर्थ से काम लेना इष्ट नहीं है ॥ ८ ॥ दहिना हाथ है आगे जिन के ऐसे दोनों हाथ और हाथों के आगे पवित्र कुश करके पितरों को एक साथ अर्घ्य देवे किन्तु पृथक् २ पितरों के नाम से अर्घ्य नहीं देवे ॥ ९ ॥ जिस कुश के भीतर अन्य कुश न हो और जिस का अग्रभाग बना हो ऐसा दो कुश का बना हुआ प्रादेशमात्र (बित्ता) भर का पवित्र सभी कर्मों में जानना चाहिये यह पवित्र की परिभाषा है ॥१०॥ यही सगर्भ कुशा का लक्षण कहा है और घी के पवित्र करनेका कुशा भी इतना ही बड़ा होता है ॥११॥ और कितनेक ऋषि इतने ही प्रमाण की हरेकुश की पवित्री कहते हैं। गीली हो अथवा सूखी परन्तु फल उस के गिरगये हों उस को पिंजली कहते हैं ॥१२॥ पितरों सम्बन्धी मन्त्रों का उच्चारण करने पर, हृदय स्पर्श करने पश्चात्, किसो नीच के देख लेने पर, अधोवायु निकल जाने पर, हंसी आजाने पर, झूठ बोलने पर, ॥ १३ ॥ बिलाव मूषा इन के छू लेने पर, गाली देने वा अपशब्द बोलने पर और क्रोध आजाने पर इन सब निमित्तों में कर्म करता हुआ

६ भाषार्थसहिता ॥

निमित्तेष्वेषुसर्व्वत्र कर्म्मकुर्व्वन्नपःस्पृशेत् ॥ १४ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ द्वितीयः खंडः ॥ २ ॥
अक्रियात्रिविधाप्रोक्ता विद्वद्भिःकर्म्मकारिणाम् ।
अक्रियाचपरोक्ताच तृतीयाचान्यथाक्रिया ॥ १ ॥
स्वशाखाश्रयमुत्सृज्य परशाखाश्रयंचयः ।
कर्त्तुमिच्छतिदुर्मेधा मोघंतत्तस्यचेष्टितम् ॥ २ ॥
यन्नाम्नातंस्वशाखायां परोक्तमविरोधिच ।
विद्वद्भिस्तदनुष्ठेय-मग्निहोत्रादिकर्म्मवन् ॥ ३ ॥
प्रवृत्तमन्यथाकुर्य्याद्यदिमोहात्कथंचन ।
यतस्तदन्यथाभूतं ततएवसमापयेत् ॥ ४ ॥
समाप्तेयदिजानीयान्मयैतदयथाकृतम् ।
तावदेवपुनःकुर्य्यान्नावृत्तिःसर्व्वकर्म्मणः ॥ ५ ॥
प्रधानस्यक्रियायत्र सांगंतत्क्रियतेपुनः ।


मनुष्य दहिने हाथ से जल का स्पर्श करे ॥१४॥ यह दूसरा खण्ड पूरा हुआ ॥

कर्म करने वालों का अकर्म (निन्दित कर्म) विद्वानों ने तीन प्रकारका कहा है ॥१॥ अक्रिया (कर्म को न करना) २ अपनी से भिन्न अन्य शाखा में कहे अनुसार कर्म करना ३ अन्यथा क्रिया जैसे चाहिये वैसे न करना विधान से विरुद्ध मन माना करे ॥१॥ जो कुबुद्धिपुरुष अपनी शाखा के कर्मों को छोड़ कर दूसरे की शाखा में कहे कर्म करने की इच्छा करता है वह उस का परिश्रम [करना] निष्फल है ॥२॥ जो कर्म वा कर्मांग अपनी शाखा में नहीं कहा और अपनी शाखा से विरुद्ध भी जो न हो समझदार मनुष्य दूसरी शाखा के कहे हुए उस कर्म को अग्निहोत्र के तुल्य स्वीकार करे ॥३॥ प्रारंभ किये कर्म को यदि किसी प्रकार अज्ञान से अन्यथा करे तो जहां से वह कर्म अन्यथा हुआ है वहां बीच में ही समाप्त करदे ॥४॥ यदि समाप्त होने पर यह प्रतीत हो कि मैंने यह काम अन्यथा किया तो जितना कर्म अन्यथा हुआ हो उतना ही फिर करदे—संपूर्ण कर्म को फिर न करे ॥५॥ जहां प्रधान (मुख्य) कर्म नहीं किया हो वा विपरीत किया हो तो वहां सब कर्म फिर से करना चाहिये—और उस कर्म का कोई अंग न किया हो तो ॥

कात्यायनस्मृतिः ॥

तदंगस्याक्रियायांच नावृत्तिर्नैव तत्क्रिया ॥ ६ ॥
मधुमध्वितियस्तत्र त्रिजपोऽशितुमिच्छताम् ।
गायत्र्यनंतरंसोऽत्र मधुमन्त्रविवर्जितः ॥ ७ ॥
नचाश्नत्सुजपेदत्र कदाचित्पितृसंहिताम् ।
अन्यएवजपःकार्य्यः सोमसामादिकःशुभः ॥ ८ ॥
यस्तत्रप्रकरोऽन्नस्य तिलवद्यववत्तथा ।
उच्छिष्टसन्निधौसोऽत्र तृप्तेषुविपरीतकः ॥ ९ ॥
संपन्नमितितृप्ताःस्युः प्रश्नस्थानेविधीयते ॥
सुसंपन्नमितिप्रोक्ते शेषमन्नंनिवेदयेत् ॥ १० ॥
प्रागग्रेष्वथदर्भेषु आद्यमामंत्र्यपूर्ववत् ।
अपःक्षिपेन्मूलदेशेऽवनेनिक्ष्वेतिपात्रतः ॥ ११ ॥
द्वितीयंचतृतीयंच मध्यदेशाग्रदेशयोः ।
मातामहप्रभृतींस्त्रीनेतेषामेववामतः ॥ १२ ॥


वहां सब कर्म की आवृत्ति न करे किन्तु उस अंग को ही करे ॥ ६ ॥ मधु मधु मधु यह जो भोजन करने वालों का तीन बार जप है वह यहां (श्राद्ध में) गायत्री के पीछे मधुवाता इत्यादि मन्त्र के बिना ही करना चाहिये ॥ ७ ॥ पितृ ब्राह्मणों के भोजन करते समय श्राद्ध में पितृसंहिता न जपे किन्तु अन्य ही सोम देवता वाले मन्त्रों और सामवेद आदि का शुभ पाठ करे ॥ ८ ॥ तिल और जौ के समान जो अन्न का प्रकर (विकिर पिण्ड) है वह उच्छिष्ट के समीप देना और ब्राह्मणों के तृप्त होने पर विपरीत (जहां उच्छिष्ट न हो) जगह देना चाहिये ॥ ९ ॥ सम्पन्न (अच्छी तरह किया) तृप्त हुए यह तो यजमान प्रश्न (पूछने) के समय कहे- जब ब्राह्मण लोग [भले प्रकार तृप्त हुये] यह कहदें तब शेष अन्न को यजमान उन के सामने निवेदन करे और जैसी आज्ञा दें वैसा करे ॥ १० ॥ पूर्व को है अग्रभाग जिन का ऐसा कुशाओं पर आद्य (पिता) का पूर्व के समान आमंत्रण करके पात्र में से अवनेनिक्ष्व इस मन्त्र से कुशाओं की जड़ में जल डाले ॥ ११ ॥ पितामह को कुशा के मध्य में और प्रपितामह को कुशा के अग्रभाग में जल छोड़ मातामह (नाना) आदि तीनों को भी इन की बांई ओर जल दे ॥ १२ ॥

८ भाषार्थसहिता ॥

सर्वस्मादन्नमुद्धृत्य व्यंजनैरुपसिच्यच । संयोज्ययवकर्कन्धूदधिभिः प्राङ्मुखस्ततः ॥ १३ ॥ अवनेजनवत्पिण्डान्दत्वा बिल्वप्रमाणकान् । तत्पात्रक्षालनेनाथ पुनरप्यवनेजयेत् ॥ १४ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥ उत्तरोत्तरदानेन पिंडानामुत्तरोत्तरः । भवेदधरचाधराणा-मधरः श्राद्धकर्मणि ॥ १ ॥ तस्माच्छ्राद्धेषुसर्वेषुवृद्धिमत्स्वितरेषुच । मूलमध्याग्रदेशेषु ईषत्सक्तांश्चनिर्वपेत् ॥ २ ॥ गन्धादीन्निःक्षिपेत्तूष्णीं ततआचामयेद्द्विजान् । अन्यात्राप्येषएवस्याद्यवादिरहितोविधिः ॥ ३ ॥ दक्षिणाप्लवनेदेशे दक्षिणाभिमुखस्यच । दक्षिणाग्रेषुदर्भेषु एषोऽन्यत्रविधिःस्मृतः ॥ ४ ॥


सब अन्न में से भोजन का भाग निकाल कर और मट्ठा आदि सेचन करके तथा जौ, बेर दही मिलाकर-फिर पूर्वाभिमुख होकर ॥ १३ ॥ बेर के समान बड़े पिंडों को अवनेजन जहां २ दिया था वहां २ देकर अवनेजन के पात्र को धोकर प्रत्यवनेजन छोड़े ॥ १४ ॥

यह तीसरा खण्ड समाप्त हुआ ॥३॥

उत्तर २ क्रमशः पिंडों के देने से पिछला २ अधः (नीचे) होता है इस से श्राद्ध कर्म में निचले २ पिण्ड को नीची २ जगह में देना चाहिये ॥ १ ॥ तिससे वृद्धि के (आभ्युदयिक) श्राद्ध वा अन्य श्राद्धों में कुशा की जड़ मध्यभाग तथा अग्रभाग में कुछ लगे हुए पिंड देने चाहिये ॥ २ ॥ बिना मंत्र गंध आदि दे और फिर द्विजों को आचमन करावे अन्य श्राद्धों (पार्वणादि) में जौ को छोड़ अन्य यही विधि होता है ॥३॥ जो देश दक्षिण को नीचा हो उस में यजमान भी दक्षिणाभिमुख बैठे और दक्षिणाग्रही कुशों पर पिंड आदि देवे यह विधि अन्य पार्वणादि श्राद्धों में कही है ॥ ४ ॥ फिर यजमान

कात्यायनस्मृतिः ॥

अथाग्रभूमिमासिंचेन् सुसंप्रोक्षितमस्त्विति ।
शिवाआपःसन्त्वितिच युग्मानेवोदकेनच ॥ ५ ॥
सौमनस्यमस्त्वितिच पुष्पदानमनन्तरम् ।
अक्षतञ्चारिष्टंञ्चास्त्वित्यक्षतान्प्रतिपादयेत् ॥ ६ ॥
अक्षय्योदकदानंतु अर्घ्यदानवदिष्यते ।
षष्ठ्यैवनित्यंतत्कुर्यान्नचतुर्थ्यांकदाचन ॥ ७ ॥
अर्घ्येऽक्षय्योदकेचैव पिण्डदानेऽवनेजने ।
तंत्रस्यतुनिवृत्तिःस्यात् स्वधावाचनएवच ॥ ८ ॥
प्रार्थनासुप्रतिप्रोक्ते सर्वास्वेवद्विजोत्तमैः ।
पवित्रांतर्हितान्पिंडान् सिंचेदुत्तानपात्रकृत् ॥ ९ ॥
युग्मानेवस्वस्तिवाच्यमङ्गुष्ठाग्रग्रहंसदा ।
कृत्वाधुर्यस्यविप्रस्य प्रणम्यानुव्रजेत्ततः ॥ १० ॥
एषश्राद्धविधिःकृत्स्न उक्तःसंक्षेपतोमया ।


जल से अपने आगे की पृथिवी को-(सुसंप्रोक्षितमस्तु) ऐसा कहकर और (शिवा आपः संतु) इस मन्त्र से दो ब्राह्मणों को साथ ही जल से सींचे ॥५॥ (सौमनस्यमस्तु) इस मंत्र से ब्राह्मणों को पुष्प समर्पण करे और (अक्षतं-चारिष्टमस्तु) इस मंत्र से अक्षत निवेदन करे ॥ ६ ॥ अर्घ देने के समान अक्षय्य जल का देना कहा है और उस अक्षय्योदक को षष्ठी (पितुः) विभक्ति बोलकर देवे किन्तु चतुर्थी (पित्रे) बोल कर कभी न देवे ॥ ७ ॥ अर्घ्य अक्षय्योदक—पिण्डदान—अवनेजन और स्वधा के वचन—इन कर्मों में तन्त्र (एक संकल्प से सब को अर्घ आदि न देवे किन्तु पृथक् २) से अर्घादि देने चाहिये ॥ ८ ॥ ब्राह्मणों ने दिया जो यजमान की प्रार्थना का उत्तर उस के अनंतर अर्घ के पात्रों को सीधे करके पवित्रियों से ढके हुए पिंडों को सींचे ॥ ९ ॥ दो २ पिंडों को सींच के स्वस्तिवाचन और अंगूठे के अग्रभाग का ग्रहण प्रथम मुख्य ब्राह्मण का करे फिर नमस्कार करके ब्राह्मणों के पीछे चले ॥ १० ॥ यह श्राद्ध की संपूर्ण विधि संक्षेप से हमने कही जो लोग इस विधि को जानते हैं वे कभी भी श्राद्ध कर्म में मूढ़-

१० भाषाधर्मसंहिता ॥

येविदंतिनमुह्यन्ति श्राद्धकर्मसुतेक्वचित् ॥ ११ ॥ इदंशास्त्रंचगुह्यंच परिसंख्यानमेवच । वसिष्ठोक्तंचयोवेद सन्नाद्धंवेदनेतरः ॥ १२ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ चतुर्थः खंडः ॥ ४ ॥ असकृद्यानिकर्माणि क्रियरन्कर्मकारिभिः । प्रतिप्रयोगनैताःस्युर्मातरःश्राद्धमेवच ॥ १ ॥ आधानेहोमयोश्चैव वैश्वदेवेतथैवच । बलिकर्म्मणिदर्शेच पौर्णमासेतथैवच ॥ २ ॥ नवयज्ञेचयज्ञज्ञा वदन्त्येवमनीषिणः । एकमेवभवेच्छ्राद्धमेतेषुनपृथक्पृथक् ॥ ३ ॥ नाष्टकासुभवेच्छ्राद्धं नान्नाद्धेश्राद्धमिष्यते । नसोष्यन्तीजातकर्म प्रोषितागतकर्मसु ॥ ४ ॥ विवाहादिःकर्म्मगणोयउक्तो गर्भाधानंशुश्रुमयरयचान्ते । विवाहादावेकमेवात्रकुर्यान्नाद्धंनादौकर्म्मणःकर्म्मणःस्यात् ५


ता को प्राप्त नहीं होते ॥११॥ इस धर्मशास्त्र को वेदान्त को और वशिष्ठ जी के कहे धर्म शास्त्र को जो जानता है वही श्राद्ध को जानता है अन्य नहीं॥१२॥ यह चौथा खण्ड पूर्ण हुआ ।

बारंबार जिन कर्मों को कर्म करने वाले करते हैं उन प्रत्येक कर्मों में ये षोडशमातृका और श्राद्ध ( नांदी मुख ) नहीं होते ॥ १ ॥ अग्नि स्थापन के आरम्भ में सायं प्रातः काल के अग्निहोत्रके आरम्भमें, चातुर्मास्य यज्ञोंके वैश्वदेव पर्व में, बलिदान में श्रौतदर्शष्टि तथा पौर्णमासेष्टि के आरम्भ में ॥ २ ॥ और नवाग्र्येष्टि के प्रारम्भ में यज्ञके जानने वाले विद्वान् याज्ञिक-लोग ऐसा कहते हैं कि इनमें से एक साथ सबन्ध होने वाले कामों में एकही श्राद्ध होता है पृथक २ नहीं ॥ ३ ॥ अष्टकाओं में और एक श्राद्ध के समय में दूसरा ( आभ्युदयिक ) श्राद्ध नहीं होता-परदेश में गई हुई सोष्यंती ( जिसके बालक हुआ हो ) उसके लौट आनेपर जातकर्मोंदि में नान्दी श्राद्ध न करे-॥ ४ ॥ विवाह आदि कर्म का जो समूह कहा है कि जिसके अन्त में वेद से गर्भाधान सुनते हैं उस विवाह के आदि में एकही नान्दी श्राद्ध होता है प्रति कर्म की आदिमें नहीं करे ॥ ५ ॥

कात्यायनस्मृतिः ॥ ११

प्रदोषेश्राद्धमेकंस्याद् गोनिष्क्रामप्रवेशयोः । तत्राङ्गेयुज्यतेकर्त्तुं प्रथमेपुष्टिकर्मणि ॥ ६ ॥ हलाभियोगादिषुतु षट्सुकुर्यात्पृथक्पृथक् । प्रतिप्रयोगमप्येषा मादावेकन्तुकारयेत् ॥ ७ ॥ बृहत्पत्रिक्षुद्रपशुस्वस्त्यर्थंपरिविष्यतोः । सूर्य्येन्द्वोःकर्मणोयेतु तयोःश्राद्धंनविद्यते ॥ ८ ॥ नदशाग्रन्थिकेश्चैव विषवह्वर्ककर्मणि । कृमिदष्टचिकित्सायां नैवशेषेषुविद्यते ॥ ९ ॥ गणशःक्रियमाणेषु मातृभ्यःपूजनंसकृत् । सकृदेवभवेच्छ्राद्ध-मादौनपृथगादिषु ॥ १० ॥ यत्रयत्रभवेच्छ्राद्धं तत्रतत्रचमातरः ।


रात में विवाह का मुहूर्त्त अथवा सायंप्रातः काल में सन्तान उत्पन्न हो तो यही एक नान्दीश्राद्ध सायंकाल प्रदोष के समय वा प्रातःकाल होता है यह यदि प्रातःकाल में करना पड़े तो गौओं के चरने को निकलने के समय और सायंकाल में करना हो तो गौओं के घर आने समय करे ॥ ६ ॥

हलका अभियोग ( प्रथम जोतना ) आदि गृह्यसूक्तोक्त ६ कर्मों में पृथक् २ श्राद्ध होता है इस से प्रत्येक कर्म के आदि में एक नान्दीश्राद्ध करावे ॥ ७ ॥

बड़े २ पक्षी और छोटे २ पशु इन के कल्याण के लिये किये कर्म में सूर्य और चन्द्रमा के परिवेष [ चारों ओर मण्डलाकार होने ] के समय में किये कर्म में नान्दीश्राद्ध न करे ॥ ८ ॥

दशाग्रन्थि कर्म में—विषवाले जीव के काटलेने पर जो कर्म होता है उस में कीड़े के काटलेने की चिकित्सा में और जो कर्म बाकी रहजाने वाले हों उन में नान्दी श्राद्ध नहीं है ॥ ९ ॥

समूह से [एक बार] किये कर्मों में षोडश मातृकाओं का पूजन और कर्म की आदि में एक बार श्राद्ध करे पृथक् २ कर्म की आदि में नहीं ॥ १० ॥

जहां २ नान्दी होता है वहां २-१६ मातृकाओं का पूजन भी अवश्य करे यहां तक मातृसूक्त

१२भाषार्थसहिता ॥

प्रासङ्गिकमिदंप्रोक्त-मतःप्रकृतमुच्यते ॥ १९ ॥

इति कात्यायनस्मृतौ पञ्चमः खण्डः ॥ ५ ॥

आधानकालायेप्रोक्तास्तथायेचाग्नियोनयः ।
तदाश्रयोग्निमादध्यादग्निमानग्रजोयदि ॥ १ ॥

दाराधिगमनाधाने यःकुर्यादग्रजाग्रिमः ।
परिवेत्तासविज्ञेयः परिवित्तिस्तुपूर्वजः ॥ २ ॥

परिवित्तिपरिवेत्तारौ नरकंगच्छतोध्रुवम् ।
अपचीर्णप्रायश्चित्तौ पादोनफलभागिनौ ॥ ३ ॥

देशान्तरस्थक्लीबैकवृषणानसहोदरान् ।
वेश्यासक्तपतितशूद्रतुल्यानिरोगिणः ॥ ४॥

जड़मूकान्धबधिरकुब्जवामनकुण्डकान् ।
अतिवृद्धानभार्यांश्च कृषिसक्तान्नृपस्यच ॥ ५ ॥


[ प्रसङ्ग में आया ] कहा अब प्रकृत ( जिस का प्रकरण था ) कहते हैं ॥ १९॥
यह पांचवां खंड पूरा हुआ ॥ ५ ॥

जो अग्नि के आधान के समय कहे हैं और जो अग्नि के कारण हैं उन्हीं में जेठा भाई अग्निहोत्र से युक्त हो तो छोटा अग्न्याधान पूर्वक अग्निहोत्र का ग्रहण करे ॥१॥

जो छोटा भाई बड़े भाई से पहिले विवाह और अग्न्याधान करता है वह परिवेत्ता और जेठा भाई परिवित्ति कहाता है ॥२॥

परिवित्ति और परिवेत्ता दोनों निश्चय नरक में जाते हैं यदि वे दोनों प्रायश्चित्त करलें तो पादोन [तीन भाग] फल के भागी होते हैं॥३॥

यदि जेठा भाई परदेश में हो वा नपुंसक हो वा जिस के एक ही अंडकोश हो वा अपना सहोदर [ सगा ] भाई न हो वा वेश्यागामी हो वा पतित हो वा शूद्र के समान हो-वा अत्यन्त रोगी हो ॥४॥

जड़ महाअज्ञानी हो वा गूंगा हो वा अंधा हो वा बहरा कुबड़ा हो खिलन्दिया बौना हो वा पिता के जीते ही जार से पैदा हुआ हो वा अत्यन्त बुड्ढा हो या जिस के स्त्री न हो वा जो राजा की खेती कराता हो ॥५॥

कात्यायनस्मृतिः ॥ १४

धनवृद्धिप्रसक्तांश्च कामतःकारिणस्तथा । कुलटोन्मत्तचोरांश्च परिविन्दन्नदुष्यति ॥ ६ ॥ धनवार्द्धुषिकंराजसेवकंकर्म्मकस्तथा । प्रोषितञ्चप्रतीक्षेत वर्षत्रयमपित्वरन् ॥ ७ ॥ प्रोषितंयद्यशृण्वानस्तदूर्ध्वंसमाचरेत् । आगतेनुपुनस्तस्मिन्पादेतच्छुद्धयर्थमाचरेत् ॥ ८ ॥ लक्षणंप्राग्गतायास्तु प्रमाणंद्वादशाङ्गुलम् । तन्मूललग्नायोदीची तस्याप्येतद्द्वयोत्तरम् ॥ ९ ॥ उदग्गतायाःसंलग्नाः शेषाःप्रादेशमात्रिकाः । सप्तसप्ताङ्गुलांस्त्यक्त्वा कुशेनैवसमुल्लिखेत् ॥१०॥ मानक्रियायामुक्तायामनुक्तेमानकर्त्तरि ।


धन के बढ़ाने में आसक्त हो वा अपनी इच्छा के अनुसार जो कर्म करता हो वा घर २ में जो फिरे वा उन्मत्त वा चोर इतने जेठे भाइयों से पहिले विवाह करने वा अग्निहोत्र लेने में छोटा भाई दोषभागी नहीं होता ॥ ६ ॥ यदिवड़ा भाई व्याज में धन को बढ़ाने वाला हो वा राजा का सेवक हो वा परदेश में हो ऐसे को जीवना करने वाला भी अग्निहोत्रादि कर्म करना चाहता हुआ छोटा भाई तीन वर्ष तक उस बड़े भाई की बाट देखे ॥ ७ ॥ यदि परदेश में रहने की खबर न हो कि कहां है तो एक वर्ष पीछे विवाह आदि करले यदि जेठा भाई फिर आजाय तो उस पाप की शुद्धि के के लिये चोथाई प्रायश्चित्त करे ॥ ८ ॥ अग्निकुण्ड बनाने के लिये जो चिह्न किया हो उस में जो रेखा पूर्व को खींचे वह बारह अंगुल की हो और उस रेखा के मूल से लगी उत्तर की रेखा दश अंगुल की खींचे ॥ ९ ॥ उत्तर को गई रेखा से मिली हुई शेष रेखा प्रादेश मात्र दश २ अंगुल की हों । उन को सात २ अंगुल छोड़ कर शेष भाग में उल्लेखन संस्कार कुशों से करे ॥ १० ॥ जहां माप करना तो कहा हो पर माप का करने वाला न कहा हो वहां विद्वानों

१४ | भाषार्थसहिता ॥

मानकृद्यजमानःस्याद्विदुषामेषनिश्चयः ॥ ११ ॥
पुण्यवानादधीताग्निं सद्विद्वद्भिःप्रशस्यते ।
अनडुर्धुक्त्वमप्यस्य काम्यैस्तन्नीयतेशमम् ॥ १२ ॥
यस्यदत्ताभवेत्कन्या वाचासत्येनकेनचित् ।
सोऽन्त्यांसमिधमाधास्यन्नादधीतैवनान्यया ॥ १३ ॥
अनूढैवतु साकन्या पञ्चत्वंयदिगच्छति ।
नतथाव्रतलोपोऽस्य तेनैवान्यांसमुद्वहेत् ॥ १४ ॥
अथचेन्नलभेतन्यां याचमानोऽपिकन्यकाम् ।
तमग्निमात्मसात्कृत्वाक्षिप्रंस्यादुत्तराश्रमी ॥ १५ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ षष्ठः खंडः ॥ ६ ॥
अश्वत्थोध्वःशमीगर्भः प्रशस्तोर्द्ध्वीसमुद्भवः ।


का यह निश्चय है कि माप का कर्त्ता यजमान होता है अर्थात् यजमान की अंगुलियों से माप करना चाहिये ॥ ११ ॥ धनवान् न होने पर भी धर्मात्मा पुण्य शील पुरुष अग्नि को विधि पूर्वक स्थापन करे क्योंकि धर्मात्मा की ही सब प्रशंसा करते हैं । और जो उस की निर्धनता है वह काम्य कर्मों के अनुष्ठान से शान्त हो कर धनी हो जाता है ॥ १२ ॥ यदि किसी ने सत्यवाणी से किसी को कन्या दी हो अर्थात् सगाई करदी हो वह वर यदि उस कन्या के जीवन पर्यन्त अग्निहोत्र करना चाहता हो तो उसी के साथ विवाह करके अवश्य अग्न्याधान करे किन्तु अन्य स्त्री के साथ अग्निहोत्र न लेवे ॥ १३ ॥ यदि वह कन्या बिना विवाही मरजाय तो तिस से इस पुरुष के व्रत (अग्निहोत्र लेने की प्रतिज्ञा) का नाश नहीं होता उसी अग्नि से दूसरी स्त्री को विवाह लेवे ॥ १४ ॥ यदि मांगने से भी अन्य कन्या न मिले तो विधिपूर्वक आत्मा में उस अग्नि का समारोप करके संन्यासी हो जावे ॥ १५ ॥

यह छठा खण्ड पूरा हुआ ॥६॥

शमीनाम वृक्षोंकर जिस में मिलकर जम गयी हो ऐसा शुद्ध भूमि में उत्पन्न जो पीपल है उस की जो पूर्व को वा उत्तर को अथवा ऊपर को गई