भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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संवर्त्तस्मृतिः ॥ ३३

सात्त्विकंभावमास्थाय दानंदद्याद्विचक्षणः ॥२१४ ॥ सप्तव्याहृतिभिःकार्यो द्विजैर्होमो जितात्मभिः । उपपातकशुद्ध्यर्थं सहस्रंपरिसंख्यया ॥२१५॥ महापातकसंयुक्तो लक्षहोमंसदाद्विजः । मुच्यतेसर्वपापेभ्यो गायत्र्याचैवपावितः ॥ २१६ ॥ अभ्यसेत्सतथापुण्यां गायत्रींवेदमातरम् । गत्वाऽरण्येनदीतीरे सर्वपापविशुद्धये ॥ २१७ ॥ स्नात्वाचविधिवत्तत्र प्राणानायम्यवाग्यतः । प्राणायामैस्त्रिभिःपूतो गायत्रींतुजपेद्विजः ॥२१८॥ अक्लिन्नवासाःस्थलगः शुचौदेशे समाहितः । पवित्रपाणिराचान्तो गायत्र्याजपमारभेत् ॥२१९॥ ऐहिकामुष्मिकंपापं सर्वंनिरवशेषतः । पञ्चरात्रेणगायत्रीं जपमानोव्यपोहति ॥२२०॥ गायत्र्यास्तुपरंनास्ति शोधनंपापकर्मणाम् ।


सात्त्विकस्वभाव ( सुशील ) होकर ज्ञानवान् पुरुष दानदे ॥ २१४ ॥ मन को जीतने वाले द्विज लोग उपपातकों की शुद्धि के अर्थ सात व्याहृतियों से एक हजार आहुति होम करें ॥२१५ ॥ तथा महापातकी गायत्री से लक्ष ( लाख ) आहुति होम करे क्योंकि गायत्री से पवित्र किया ब्राह्मण सब पापों से मुक्त होजाता है ॥२१६॥ सर्वपापों की शुद्धि के लिये वेदों की माता पवित्र गायत्री का वन में जाकर वा नदी के तट पर जप करे । २१७॥ नदी तालाब आदि में विधिपूर्वक स्नान तथा आचमन करके तीन प्राणायामों से पवित्र हुआ द्विज गायत्री का जप करे ॥२१८॥ क्लिन्न (गीले) वस्त्र न पहनकर शुद्ध स्थान पर स्थल में बैठ के सावधान होकर कुशाओं की पवित्री धारण कर आचमन के पश्चात् गायत्री के जप का आरम्भ करे ॥२१९॥ पांच दिन तक गायत्री का जप करता हुआ, पुरुष इस जन्म और अन्य जन्म के संपूर्ण पापों को नष्ट करता है ॥२२०॥ पापियों को शुद्ध करने वाला गायत्री से परे अन्य उपाय नहीं है महाव्याहृति और