भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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३४ भाषार्थसहिता ॥

महाव्याहृतिसंयुक्तां प्रणवेनचसंजपेत् ॥२२१॥ ब्रह्मचारीनिराहारः सर्वभूतहितेरतः । गायत्र्यालक्षजप्येन सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥२२२॥ अयाज्ययाजनंकृत्वा भुक्त्वाचान्नंविगर्हितम् । गायत्र्यष्टसहस्रंतु जपंकृत्वाविशुद्ध्यति ॥२२३॥ अहन्यहनियोधीते गायत्रींवेदद्विजोत्तमः । मासेनमुच्यतेपापा-त्पन्नगःकंचुकाद्यथा ॥२२४॥ गायत्रींयस्तुविप्रोवै जपेन्नियतस्सदा । सयातिपरमंस्थानं वायुभूतःखमूर्तिमान् ॥२२५॥ प्रणवेनचसंयुक्ता व्याहृतीःसप्तनित्यशः । गायत्रींशिरसासाद्धं मनसात्रिःपठेद्द्विजः ॥२२६॥ निगृह्यचात्मनःप्राणा-न्प्राणायामोविधीयते । प्राणायामत्रयं कुर्या-न्नित्यमेवसमाहितः ॥२२७॥ मानसंवाचिकंपापं कायेनैवचयत्कृतम् ।


ोंकार सहित गायत्री का जप करे ॥ २२१ ॥ ब्रह्मचारी भोजन को छोड़ कर सब के कल्याण में तत्पर हुआ एक लाख गायत्री का जप कर ने से सब पापों से मुक्त होता है ॥ २२२ ॥ यज्ञ कराने के अयोग्य पुरुष के यहां यज्ञ कराकर और निन्दित अन्न को खाकर आठ हजार गायत्री का जप करने से शुद्ध होता है ॥ २२३ ॥ जो ब्राह्मण प्रतिदिन गायत्री का जप करता है वह पाप से इस प्रकार छूटता है जैसे कांचली से सांप ॥२२४॥ जो ब्राह्मण इन्द्रियों को वश में करके सदा गायत्री का जप करता है वह वायु और आकाश रूप होकर उत्तम स्थान को प्राप्त होता है ॥२२५॥ ओंकार सहित सातव्याहृति और (आपोज्योती०) इस शीर्ष मन्त्र सहित गायत्री अर्थात् प्राणायाम को द्विज तीन बार नित्य करे ॥२२६॥ प्राणों को वश में करने को प्राणायाम कहते हैं सावधान हो कर प्रतिदिन तीन प्राणायाम करे ॥२२७॥ मन वाणी देह से किया जो पाप