भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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३२ पाराशर्यसंहिता ॥

तिलंधेनुंचयोदद्या-त्संयतायद्विजातये । ब्रह्महत्यादिभिःपापै-र्मुच्यतेनात्रसंशयः ॥ २०८ ॥ माघमासेतुसंप्राप्ते पौर्णमास्यामुपोषितः । ब्राह्मणेभ्यस्तिलान्दत्वा सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥२०९॥ उपवासीनरोभूत्वा पौर्णमास्यांतुकार्तिके । हिरण्यंवस्त्रमन्नंच दत्वातरतिदुष्कृतम् ॥२१०॥ अयनेविषुवेचैव व्यतीपातेदिनक्षये । चन्द्रसूर्यग्रहेचैव दत्तंभवतिचाक्षयम् ॥ २११ ॥ अमावास्याचद्वादश्यां संक्रांतौचविशेषतः । एताःप्रशस्तास्तित्थयो भानुवारस्तथैवच ॥२१२॥ तत्रस्नानंजपोहोमो ब्राह्मणानांचभोजनम् । उपवासस्तथादान-मेकैकंपावयेन्नरम् ॥ २१३ ॥ स्नातःशुचिर्धौतवासाः शुद्धात्माविजितेन्द्रियः ।


जो जितेन्द्रिय ब्राह्मण को तिल तथा गौ को देता है वह ब्रह्महत्या आदि पापों से निर्मुक्त हो जाता है इस में संशय नहीं है ॥२०८॥ माघ महीने की पूर्णमासी को उपवास करके जो तिलों का दान ब्राह्मणों को देता है वह सब पापों से मुक्त होजाता है ॥ २०९ ॥ कार्तिक की पूर्णमासी को उपवास करके सोना-वस्त्र और अन्न इन का दान देकर पापसागर से तरजाता है॥२१०॥ दक्षिणायन, उत्तरायण-विषुव(तुल मेष)की संक्रान्ति, व्यतिपात योग-तिथि की हानि, चन्द्र और सूर्य के ग्रहण-में दिया हुआ दान अक्षय होता है ॥ २११ ॥ अमावस, द्वादशी, संक्रान्ति विशेष कर ये तिथौ और रविवार ये दान के लिये बहुत श्रेष्ठ हैं॥ २१२॥ इन में किये हुये स्नान, जप, होम और ब्राह्मणों को भोजन उपवास तथा दान प्रत्येक मनुष्य को पवित्र करते हैं ॥ २१३ ॥ स्नान करके तथा शुद्ध होकर धुले हुये श्वेत वस्त्र धारणकर शुद्ध मन हो इन्द्रियों को जीत कर और