अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंवर्त्तस्मृतिः ॥ ३१
चांडालेसंकरेविप्रः श्वपाकेपुल्कसेपिवा । गोमूत्रयावकाहारो मासाद्धेर्नविशुद्ध्यति ॥२ १॥ पतितेनतुसंसर्गं मासमासार्द्धमेववा । गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥२०२॥ पतिताद्द्रव्यमादत्ते भुंक्ते वाब्राह्मणोयदि । कृत्वातस्यसमुत्सर्ग-मतिकृच्छ्रं चरेद्द्विजः ॥ २०३ ॥ यत्रयत्रचसंकीर्ण मात्मानंमन्यतेद्विजः । तत्रतत्रतिलैर्होमो गायत्र्याप्रत्यहंद्विजः ॥ २०४ ॥ एषएवमयाप्रोक्तः प्रायश्चित्तविधिःशुभः अनादिष्टेषुपापेषु प्रायश्चित्तंनचोच्यते ॥ २०५ ॥ दानैर्होमैर्जपैर्नित्यं प्राणायामैर्द्विजोत्तमः । पातकेभ्यःप्रमुच्येत वेदाभ्यासान्नसंशयः ॥२०६॥ सुवर्णदानंगोदानं भूमिदानंतथैवच । नाशयन्त्याशुपापानि ह्यन्यजन्मकृतान्यपि ॥२०७॥
चांडाल-वर्णसंकर-श्वपाक-और पुल्कस इन के भोजन को खाकर पंद्रह दिन में शुद्ध होता है ॥ २०१ ॥ एक मास अथवा पंद्रह दिन पतित का संसर्ग (मेल) करे तो गोमूत्र और जौं का खाकर पंद्रह दिन में शुद्ध होता है ॥ २०२ ॥ जो ब्राह्मण पतित के द्रव्य को ग्रहण करता है अथवा खाता है वह उस अन्न का त्याग ( वमन ) करके अतिकृच्छ्र व्रत करे ॥ २०३ ॥ जिस २ कर्म में द्विज अपने को संकीर्ण (पतित) समझे उसी २ कर्म में गायत्री मन्त्र से तिलों का प्रतिदिन होम करे ॥२०४॥ यह हमने प्रायश्चित्त का श्रेष्ठ विधान कहा और जो पाप अनादिष्ट (शास्त्र में नहीं कहे) हैं उनका प्रायश्चित्त भी नहीं कहा है॥२०५॥ दान होम जप-प्राणायाम-और वेद पाठ-इनके करने से ब्राह्मण सदैव उन पाप से मुक्त होता है ॥२०६॥ सोना-गौ और पृथ्वी इनका दान अन्य जन्म के किये हुये पापों को भी शीघ्र नष्ट कर देता है ॥ २०७॥