अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३० भाषाधर्मसंहिता ॥
श्वकाकच्छिष्टगोच्छिष्टं भक्षणेतुत्र्यहंद्विजः ॥१९४॥
विडालमूषिकोच्छिष्टे पञ्चगव्यंपिबेद्विजः ।
शूद्रोच्छिष्टंतथाभुक्त्वा त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥१९५॥
पलाण्डुलशुनंजग्ध्वा तथैवग्रामकुक्कुटम् ।
छत्राकंविरुराहञ्च चरेत्सान्तपनंद्विजः ॥१९६॥
श्वविडालखरोष्ट्राणां कपेर्गोमायुकाकयोः ।
प्राश्यमूत्रपुरीषंच चरेच्चान्द्रायणव्रतम् ॥१९७॥
अन्नंपर्युषितंभुक्त्वा केशकीटैरुपद्रुतम् ।
पतितैःप्रेक्षितंचापि पंचगव्यंद्विजःपिबेत् ॥१९८॥
अन्त्यजाभाजनेभुक्त्वा ह्युदक्याभाजनेतथा ।
गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥१९९॥
गोमांसंमानुषंचैव शुनोहस्तात्समाहृतम् ।
अभक्ष्यंतद्भवेत्सर्वं भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् ॥२००॥
कौआ और गौ इन के उच्छिष्ट को भक्षण करके द्विज तीन दिन उपवास करे ॥१९४॥ बिलाव और मूसा इन के उच्छिष्ट को भक्षण कर द्विज पंचगव्य पीवे । तथा शूद्र के उच्छिष्ट को खाकर तीन दिन के उपवास करने से शुद्ध होता है ॥१९५॥ पलांडु (प्याज) लस्सन और गांव के मुर्गा का मांस-छत्राक (कठ फूल जिस के ऊपर छत्रीसी होती है वर्षा में पैदा होता है) और विष्ठा खाने वाले सूकर के मांस को खाकर द्विज सांतपन व्रत करे ॥१९६॥ कुत्ता-बिलाव-गधा-ऊंट-वानर गीदड़ और कौआ इन के मूत्र वा विष्ठा को खाकर चांद्रायण व्रत करे ॥१९७॥ जो अन्न बासा हो-अथवा जिस में केश वा कीड़े पड़े हों अथवा जिस को पतितों ने देखा हो उस अन्न को भक्षणकर द्विज एक दिन पञ्चगव्य पीवे ॥१९८॥ अंत्यजस्त्री के अथवा रजस्वला के पात्र में खाकर गोमूत्र और जौं को खाकर पंद्रह दिन में शुद्ध होता है ॥१९९॥ गौका वा मनुष्य का मांस जो वा कुत्ते के मुख से आया हो वह अभक्ष्य है उसे खाकर चांद्रायण व्रत करे ॥ २०० ॥