भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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संवर्त्तस्मृतिः ॥ २९

चांडालभांडसंस्पृष्टं पिबेत्कूपगतंजलम् ।
गोमूत्रयावकाहार-स्त्रिरात्रेणविशुद्ध्यति ॥१८८॥
अन्त्यजैःस्वीकृतेतीर्थे तडागेषुनदीषुच ।
शुद्ध्यतेपञ्चगव्येन पीत्वातोयमकामतः ॥१८९॥
सुराघटप्रपातोयं पीत्वानासाजलंतथा ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पञ्चगव्यंपिबेद्विजः ॥१९०॥
कूपेविण्मूत्रसंस्पृष्टाः प्राश्यचापोद्विजातयः ।
त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यन्ति कुम्भेसान्तपनंस्मृतम् ॥१९१॥
वापीकूपतडागाना-मुपहतानांविशोधनम् ।
अपांघटशतोद्धारः पञ्चगव्यंचनिक्षिपेत् ॥१९२॥
स्त्रीक्षीरमाविकम्पीत्वा सन्धिन्द्याचैवगोःपयः ।
तस्यशुद्धिस्त्रिरात्रेण द्विजानांचैवभक्षणे ॥१९३॥
विण्मूत्रभक्षणेचैव प्राजापत्यंसमाचरेत् ।


चांडाल के पात्र का जिस में स्पर्श हुआ हो ऐसे कुये के जल को पीकर गोमूत्र और जौं को खाकर तीन दिन में शुद्ध होता है ॥ १८८ ॥ नदी तथा तालाबों के जिस घाट पर भंगी आदि अन्त्यज स्नानादि सदा करते हों वहां के जल को भूल से पीकर पंचगव्य से शुद्ध होता है ॥ १८६ ॥ द्विज पुरुष मदिरा के घड़े तथा प्याऊ के और नासिका से जल को पीकर एक दिन उपवास करके पंचगव्य पीवे ॥१९०॥ द्विज लोग विष्ठा मूत्र मिश्रित कूप के जल को पीकर तीन दिन के उपवास से शुद्ध होते और विष्ठादि मिले घड़े के जल को पीने पर सांतपन कृच्छ्र व्रत से शुद्ध होते हैं ॥१९१॥ अपवित्र वस्तु जिन में पड़ा हो ऐसे बावड़ी-कूप और तालाब इन का संशोधन इस प्रकार होता है कि सौ घड़े जल के निकाल कर उस में पंचगव्य डाल दे ॥१९२॥ मनुष्य स्त्री, भेड़ और संधिनी ( जो गर्भवती हो परन्तु दूध भी देती हो ऐसी ) गौ इन के दूध को जो पीवे उस की शुद्धि तीन दिन उपवास और ब्राह्मणों को भोजन कराने से होती है ॥ १९३ ॥ विष्ठा और मूत्र के भक्षण में प्राजापत्य व्रत करे तथा कुत्ता