भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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२८ माधायंसंहिता ॥

चांडालैस्तुहतायेतु द्विजादंष्ट्रिसरीसृपैः । श्राद्धंतेषांनकत्तंव्यं ब्रह्मदंडहताश्चये ॥ १८२ ॥ कृत्वामूत्रपुरीषंतु भुक्त्वोच्छिष्टस्तथाद्विजः । श्वादिस्पृष्टोजपेद्देव्याः सहस्रंस्नानपूर्वकम् ॥ १८३ ॥ चांडालंपतितंस्पृष्ट्वा शवमंत्यजमेवच । उदक्यांसूतिकांनारीं सवासाःस्नानमाचरेत् ॥ १८४ ॥ स्पृष्टेनसंस्पृशेद्यस्तु स्नानंतस्यविधीयते । ऊर्ध्वमाचमनंप्रोक्तं द्रव्याणांप्रोक्षणंतथा ॥ १८५ ॥ चांडालाद्यैस्तुसंस्पृष्ट उच्छिष्टश्चेद्विजोत्तमः । गोमूत्रयावकाहार स्त्रिरात्रेणविशुद्ध्यति॥ १८६ ॥ शुनापुष्पवतीस्पृष्टा पुष्पवत्यान्ययातथा । शेषाण्यहान्युपवसे-त्स्नात्वाशुद्ध्येद्घृताशना ॥१८७॥


जो चांडाल दाढ़वाले (कुत्ता आदि) सांप और ब्राह्मण का शाप इन से जो द्विज मरे हों उनके लिये श्राद्ध नहीं करना चाहिये॥१८२॥ भोजनसे उच्छिष्ट ब्राह्मण को तथा जिसने मूत्र और मल का त्याग किया हो उसको यदि कुत्ता आदि स्पर्श कर लें तोवह स्नान करके एक सहस्र गायत्री का जप करे ॥१८३॥ चांडाल-पतित, मुर्दा अंत्यज रजस्वला और दश दिन के भीतर सूतिका स्त्री इनका स्पर्श करके सचैल स्नान करे ॥ १८४ ॥ इनके स्पर्श करने वाले ने जिसका स्पर्श किया हो वह स्नान ही करे पुनः आचमन करे और द्रव्यों (वस्त्र आदि) को जल से छिड़क ले ॥ १८५ ॥ यदि उच्छिष्ट ब्राह्मण को चांडाल आदि स्पर्श करले तो गोमूत्र और जौंकी खाकर तीनदिनमें शुद्ध होता है ॥१८६॥ यदि रजस्वला स्त्री को कुत्ता वा अन्य रजस्वला स्त्री स्पर्श करले तो शुद्धि के जो दिन बाकी हों उन में उपवास करे फिर स्नान करके घी के खाने से शुद्धि होती है ॥ १८७ ॥