भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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संवर्त्तस्मृतिः ॥ २७

कुर्यात्कृच्छ्रं समानं तन् षण्मासांस्तदनंतरम् । विषाग्निश्यामशबला स्तेषामपिविनिर्द्दिशेत्॥१७५॥ स्त्रीणांचतथाचरणे गर्ह्याभिगमनेषु । पतनेष्वप्ययंदृष्टः प्रायश्चित्तविधिःशुभः ॥१७६॥ नृणांविप्रतिपत्तौच पावनःप्रेत्यचेहच । गोविप्रप्रहतेचैव तथाचैवात्मघातिनि ॥ १७७ ॥ नैवाश्रुपतनंकार्यं सद्भिःश्रेयोभिकांक्षिभिः । एषामन्यतमंप्रेतं योवहेत्तद्दहेत्तथा ॥ १७८ ॥ कृत्वाचोदकदानंतु चरेच्चांद्रायणंव्रतम् । तच्छवंकेवलंस्पृष्ट्वा अश्रुनोपातितंयदि ॥ १७६ ॥ पूर्वकेष्वपकारीचे-देकाहंक्षपणंतथा । महापातकिनांचैव तथाचैवात्मघातिनाम् ॥ १८० ॥ उदकंपिंडदानंच श्राद्धंचैवहियत्कृतम् । नोपतिष्ठतितत्सर्वं राक्षसैर्विप्रलुप्यते ॥ १८१ ॥


तो वह निरंतर छः मास पर्यन्त कृच्छ्रव्रत करै और विष तथा अग्निसे जो काले और कबरे हो जांय वे भी पूर्वोक्त कृच्छ्रव्रत ही करें ॥ १७५ ॥ स्त्री को ब्रह्मचारिणी रहने व्रत करने का नियम करके संतान के लिये पुनः गृहस्थ की इच्छा हो तथा निन्दित स्त्रीयों के साथ व्यभिचार करनेपर स्त्रियोंको भी पूर्वोक्त ही प्रायश्चित्त कहा है। जाति मे पतित होने के कामों में भी ऋषियों ने यही प्रायश्चित्त अच्छा कहा है ॥ १७६ ॥ मनुष्यों के परस्पर विरोध में पूर्वोक्त कृच्छ्र इस लोक और परलोक में पवित्र करने वाला है। गो और ब्राह्मण से मरा तथा जो आत्मघात से मरा हो ॥ १७७ ॥ इनका मरण होने पर अपने हितके अभिलाषी सज्जन आंसू न गिरावें और इन में से किसी मुर्दाको जो श्मशानमें लेजाय अथवा जलावे ॥ १७८ ॥ उ ने यदि आंसू न गिराये हों तो जलदान तथा उस मुर्दे का केवल स्पर्श करके चान्द्रायण व्रत करे ॥१७९॥ तथा पूर्वोक्त प्रायश्चित्त न कर सकता हो तो एक दिन उपवास करै महापातकी और आत्मघाती ॥ १८० ॥ इनको जल दान पिंडदान श्राद्ध जो किया हो वह सब नहीं मिलता उसे राक्षस नष्ट करदेते हैं ॥ १८१॥