भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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३६भाषाटीकासहिता ॥

तस्यपापविशुद्ध्यर्थ-मतिकृच्छ्रोविधीयते ॥ १६८ ॥
वैश्यजां ब्राह्मणोगत्वा कृच्छ्रमेकंसमाचरेत् ।
एवंशुद्धिःसमाख्याता संवर्तस्यवचोयथा ॥१६९॥
कथंचिद्ब्राह्मणींगत्वा क्षत्रियोवैश्यएवच ।
गोमूत्रयावकाहारो मासेनेकेनशुद्ध्यति ॥१७०॥
शूद्रस्तुब्राह्मणींगच्छे-त्कदाचित्काममोहितः
गोमूत्रयावकाहारो मासेनेकेनशुद्ध्यति ॥१७१॥
ब्राह्मणीशूद्रसंपर्कं कदाचित्समुपागता ।
कृच्छ्रचांद्रायणंतस्याः पावनंपरमंस्मृतम् ॥ १७२ ॥
चांडालंपुल्कसंचैव श्वपाकंपतितंतथा ।
एताःश्रेष्ठःस्त्रियोगत्वा कुर्याच्चान्द्रायणंत्रयम् ॥१७३॥
अतःपरंप्रदुष्टानां निष्कृतिंश्रोतुमर्हथ ।
संन्यस्यदुर्मतिःकश्चि-दपत्यार्थंस्त्रियंव्रजेत् ॥ १७४ ॥


पाप निवृत्ति के अर्थ अतिकृच्छ्र व्रत कहा है ॥ १६८ ॥ वैश्य की कन्या के संग भोग करके ब्राह्मण एक कृच्छ्र व्रत करे। संवर्त ऋषि के वचन के अनुसार इस प्रकार शुद्धि कही है ॥ १६९ ॥ क्षत्रिय और वैश्य कदाचित् ब्राह्मणी के संग भोग करें तो गोमूत्र और जौंको खाकर एक मास में शुद्ध होते हैं ॥ १७० ॥ यदि कदाचित् काम से मोहित हुआ शूद्र ब्राह्मणी के संग गमन करे तो गोमूत्र और जौं को खाकर एक महीने में शुद्ध होता है। १७१॥ कदाचित् ब्राह्मणी ही शूद्र के संग भोग करे तो उस ब्राह्मणी का पवित्र करने वाला कृच्छ्र चांद्रायण व्रत कहा है ॥ १७२ ॥ चांडाल पुल्कस श्वपाक और पतित इन की स्त्रियों के संग श्रेष्ठ (द्विजाति) पुरुष गमन करके तीन चांद्रायण व्रत करे ॥ १७३ ॥ इस से आगे अत्यंत दुष्टों का प्रायश्चित्त सुनो । यदि कोई दुष्ट बुद्धि पुरुष संन्यास लेकर संतान के लिये स्त्री का संग करता है ॥ १७४ ॥

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