भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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संवर्तस्मृतिः ॥ २५

पितृव्यदारगमने भ्रातृभार्यागमेतथा ।
गुरुतल्पव्रतं कुर्या-न्निष्कृतिर्नान्यथाभवेत् ॥ १६२ ॥
पितृभार्यांसमारुह्य मातृवर्जां नराधमः ।
भगिनीं मातुलसुतां स्वसारंचान्यमातृजाम् ॥ १६३ ॥
एतास्तिस्र स्त्रियोगत्वा तप्तकृच्छ्रं समाचरेत् ।
कुमारीगमने चैव व्रतमेतत्समाचरेत् ॥ १६४ ॥
पशुवेश्याभिगमने प्राजापत्यं विधीयते ।
सखिभार्यां कुमारींच श्वश्रूंवाश्यालिकांतथा ॥१६५॥
मातरंयोधिगच्छेच्च स्वसारंपुरुषोधमः ।
नतस्यनिष्कृतिंदद्या-त्स्त्रांचैवतनुजांतथा ॥ १६६ ॥
नियमस्थांत्रतस्थांवा योभिगच्छेत्तिस्त्रियंद्विजः ।
सकुर्यात्प्राकृतंकृच्छ्रं धेनुंदद्यात्पयस्विनीम् ॥ १६७ ॥
रजस्वलांतुयोगच्छेद् गर्भिणींपतितांतथा।


चाचा की स्त्री चाची और भौजाई इनके संग भोग करने में गुरु की स्त्री के गमन का प्रायश्चित्त करे अन्यथा पाप की निवृत्ति नहीं होती ॥१६२॥ माता से अन्य पिता की स्त्री-और मामा की पुत्री अपनी बहिन-तथा दूसरी माता में उत्पन्न हुई अपनी भगिनी ॥ १६३ ॥ इन तीनों स्त्रियों के संग कोई नीच प्रकृति मनुष्य भोग करे तो तप्तकृच्छ्र व्रत करे और कुमारी ( जिसका विवाह न हुआ हो ) के गमन में भी यही कृच्छ्र करे ॥१६४॥ पशु और वेश्या के गमन में प्राजापत्य व्रत करे-मित्र की स्त्री-सासु और साले की स्त्री ॥ १६५ ॥ माता-बहिन-और अपनी लड़की इनके संग जो पुरुषों में नीच भोग करता है उसका प्रायश्चित्त नहीं है ॥१६६॥ नियम तथा व्रत में स्थित स्त्री के संग जो द्विज भोग करता है वह प्राकृत कृच्छ्र व्रत करे और दूध देती हुई गौ का दान करे ॥१६७। रजस्वला-गर्भवती और पतित स्त्री के संग जो पुरुष भोग करता है उस को

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