अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 229, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ भाषार्थसहिता ॥
शैलूषोरजकीञ्चैव वेणुचर्मोपजीविनी । एतागत्वा द्विजोमोहा-च्चरेच्चांद्रायणंव्रतम् ॥ १५४॥ क्षत्रियामथवैश्यांवा गच्छेद्यःकाममोहितः । तस्यसांतपनःकृच्छ्रो भवेत्पापापनोदनः ॥ १५५ ॥ शूद्रांतुब्राह्मणोगत्वा मासमासार्द्धमेववा । गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥ १५६ ॥ विप्रामस्वजनांगत्वा प्रजापत्येनशुद्ध्यति । स्वजनांतुद्विजोगत्वा प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥१५७॥ क्षत्रियांक्षत्रियोगत्वा तदेवव्रतमाचरेत् । नरोगोगमनंकृत्वा कुर्याच्चांद्रायणंव्रतम् ॥ १५८ ॥ मातुलानींतथाश्वश्रूं सुतांवैमातुलस्यच । एतागत्वास्त्रियोमोहा-त्पराकेणविशुद्ध्यति ॥ १५९ ॥ गुरोर्दुहितरंगत्वा स्वसारंपितुरेवच । तस्यदुहितरंचैव चरेच्चांद्रायणंव्रतम् ॥ १६० ॥
क्षत्रिया अथवा वैश्या के संग जो काम में मोहित हुआ ब्राह्मण गमन करता है उस के पाप का पृथक् करने वाला सांतपन कृच्छ्र व्रत है ॥१५५॥ एक मास अथवा पंद्रह दिन तक शूद्रा के साथ गमन करके-पंद्रह दिन तक गोमूत्र और जौको खाकर शुद्ध होता है॥१५६॥ जिसके कोई पुरुष न हो ऐसीब्राह्मणी केसंग गमन करके प्राजापत्य से शुद्ध होता है पुत्रादिवालीब्राह्मणीस्त्री के संग भी गमनसे द्विज प्राजापत्य व्रत से शुद्ध होता है॥१५७॥ क्षत्रिय क्षत्रिया के सग भोग करके प्राजापत्य व्रत ही करै । और मनुष्य गौके संग गमन करके चांद्रायण व्रत करै ॥१५८॥ मामा की स्त्री-सास और मामा की पुत्री इनके संग भूल से गमन करके पराक (बारह दिन का उपवास) व्रत करने से सम्यक् प्रकार शुद्ध होता है ॥१५९॥ गुरुकी पुत्री-पिताकी बहन और-फूफा की पुत्री इनके संग भोग करके चांद्रायण व्रत करै ॥ १६१ ॥
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