भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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संवर्त्तस्मृतिः ॥ २३

श्येनगृध्रानुलूकांश्च पारावतमथापिवा ॥ १४७ ॥ टिट्टिभंजालपादंच कोकिलंकुकुटंतथा । एषांवधेनरःकुर्या देकरात्रमभोजनम् ॥ १४८ ॥ पूर्वोक्तानांतुसर्वेषां हंसादीनामशेषतः । अहोरात्रोषितस्तिष्ठे-ज्जपन्वैजातवेदसम् ॥ १४९ ॥ मण्डूकंचैवह्नन्वाच सर्पमार्जारमूषकम् । त्रिरात्रोपोषितस्तिष्ठे-त्कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥१५०॥ अनस्थीन्ब्राह्मणोहत्वा प्राणायामेनशुद्ध्यति । अस्थिमतांवधेविप्रः किंचिद्दद्याद्विचक्षणः ॥१५१॥ यश्चांडालींद्विजोगच्छे-त्कथंचित्काममोहितः । त्रिभिःकृच्छ्रै स्तुशुद्ध्येत,प्राजापत्यानुपूर्वकैः ॥१५२॥ पुंश्चलीगमनंकृत्वा कामतोकामतोषिवा । कृच्छ्रंचांद्रायणंतस्य पावनंपरमंस्मृतम् ॥ १५३ ॥


होता-तीतर, श्येन-गीध-उल्लू-कबूतर ॥ १४७ ॥ टिट्टिभ (टटीरी) जालपाद (हंसभेद) कोयल और मुरगा इन के मारने में मनुष्य एक दिन उपवास करै ॥१४८॥ पूर्व कहे सर्व जीव तथा विशेष कर हंस आदि के मारने में एक दिन रात उपवास करके अग्निमंत्र का जप करता हुआ खड़ा रहे ॥ १४९ ॥ मेंडक-सांप-बिलाव और मूसा-इन को मार कर तीन उपवास करैनया ब्राह्मणों को भोजन करावै॥१५०॥जिन में हड्डी न हो ऐसे मक्खीमच्छरादि जीवों को हनन कर ब्राह्मण प्राणायाम से शुद्ध होता है और जिन में हड्डी हैं ऐसे क्षुद्र जीवों के मारने में कुछदान करै ॥१५१॥ जो काम से मोहित हुआ द्विज चांडाली के संग गमन करै वह क्रम से प्राजापत्य आदि तीन कृच्छ्रों से शुद्ध होता है ॥ १५२ ॥ ज्ञान से अथवा अज्ञानसे जो व्यभिचारिणी के संग गमन करै उसके कृच्छ्र तथा चांद्रायण ये दोनों व्रत परम संशोधक हैं ॥ १५३ ॥ नटिनी-धोबिन-बांस और चमड़े से जीने वाली इन के संग प्रमाद से गमन करके द्विज चांद्रायण व्रत करै ॥१५४ ॥