अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२ भाषाऽर्थसहिता ॥
दीयमाने विपत्तिःस्या-त्पुण्यमेवनपातकम् ॥१४०॥ प्रायश्चित्तस्यपादं तु रोधेषुव्रतमाचरेत् । द्वौपादौबंधनेचैव पादोनंयंत्रणेतथा ॥ १४१ ॥ पाषाणैर्लगुडैर्दण्डै-स्तथाशस्त्रादिभिर्नरः । निपातनेचरेत्सर्वं प्रायश्चित्तंदिनत्रयम् ॥ १४२ ॥ हस्तिनंतुरगंहत्वा महिषोष्ट्रंकपिन्तथा । एषांवधेद्विजःकुर्या-त्सप्तरात्रमभोजनम् ॥ १४३ ॥ व्याघ्रंश्वानंखरंसिंहं ऋक्षंसूकरमेवच । एतान्हत्वाद्विजोमोहात् त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥१४४॥ सर्वासामेवजातीनां मृगाणांवनचारिणाम् । अहोरात्रोषितस्तिष्ठे-ज्जपन्वैजातवेदसम् ॥ १४५ ॥ हंसंक्रांकंबलाकाञ्च बर्हिकारंडवावपि । सारसंचामभासौच हत्वात्रिदिवसंसंक्षिपेत् ॥१४६॥ चक्रवाकंतथाक्रौंचंसारिकाशुकतित्तिरीन् ।
औषध घी अथवा भोजन देने से यदि गौ वा ब्राह्मण मृत्यु को प्राप्त होजावे तो पुण्य ही होता है पाप नहीं ॥ १४० ॥ रोकने से यदि गौ मरे तो चौथाई प्रायश्चित्त और बांधने से आधा और वश में करनेसे मरे तो पादोन [पौन] करे ॥ १४१॥ पत्थर सोटा डण्डा और शस्त्र इन से धमकानेपर गौ मर जाय तो तीन दिन तक पूरा प्रायश्चित्त करे ॥ १४२ ॥ हाथी-घोड़ा-भैंस ऊंट-और वानर-इनके मारने पर द्विज सात दिन तक भोजन न करे ॥ १४३ ॥ बाघ कुत्ता-गधा-सिंह-ऋक्ष और सूकर इनको अज्ञान से मार कर तीन दिनके व्रतसे रात्रमें शुद्ध होता है ॥१४४॥ वनमें विचरते संपूर्ण जाति के मृगों के मारनेमें एक दिनरात उपवास करके अग्नि देवता वाले मन्त्रका जप करता हुआ खड़ा रहे ॥१४५॥ हंस कौआ वगला मोर कारंडव (हंसभेद) सारस और पपीहा इन पक्षियोंको मारकर तीन दिन उपवास करे ॥ १४६ ॥ चकवा-क्रूंच-मैना-