भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226

संवर्त्तस्मृतिः ॥ २१

गोघ्नःकुर्वीतसंस्कारं गोष्ठेगोरुपसन्निधौ ।
तत्रैवक्षितिशायीस्या-न्मासाद्धं संयतेन्द्रियः ॥१३३॥
स्नानंत्रिषवणंकुर्या-न्नखलोमदिवर्जितः ।
सक्तुयावकभिक्षाशी पयोदधिशकृन्नरः ॥१३४॥
एतानिक्रमशोऽश्नीयाद् द्विजस्तत्पापमोक्षकः ।
गायत्रींचजपेन्नित्यं पवित्राणिचशक्तितः ॥१३५॥
पूर्णेचैवार्द्धमासेच सविप्रान्भोजयेद्द्विजः ॥
भुक्तवत्सुचविप्रेषु गांचदद्याद्विचक्षणः ॥ १३६ ॥
व्यापन्नानांबहूनांतु रोधनेबन्धनेपिवा ।
भिषङ्मिथ्योपचारेच द्विगुणं व्रतमाचरेत् ॥ १३७ ॥
एकाचेद्बहुभिः काचि-द्दैवाद्व्यापादिताक्वचित् ।
पादंपादांतुहत्याया-श्चरेयुस्तेपृथक्पृथक् ॥ १३८ ॥
यंत्रणेगोश्चिकित्सार्थे गूढगर्भविमोचने ।
यदियतविपत्तिःस्या-न्नसपापेनलिप्यते ॥ १३६ ॥
औषधंस्नेहमाहारं दद्याद्गोब्राह्मणेषुच ।


वह मनुष्य तीन काल स्नान करे और नख तथा लोम इन को न रक्खे-
सत्तू जौ दूध-दही और गोबर ॥ १३४ ॥ इन को क्रम से गोहत्या के पाप से मुक्ति चाहने वाला द्विज भोजन करे-और यथाशक्ति गायत्री तथा अन्य पवित्र मंत्रों को नित्य जपे ॥ १३५ ॥ जब आधा महीना व्यतीत होजाय तब वह द्विज ब्राह्मणों को भोजन करावे जब ब्राह्मण भोजन कर चुकें उस समय गोदान भी करे ॥ १३६ ॥ रोकने अथवा बांधने में अथवा विरुद्ध चिकित्सा से बहुत गौ मर जांय तो गोहत्या का द्विगुण व्रत करे ॥ १३७ ॥ यदि कदाचित् कोई एक गौ बहुतों ने मारडाली हो तो वे पृथक् २ गोहत्या का चौथाई प्रायश्चित्त करें ॥ १३८ ॥ चिकित्सा के अर्थ वश करने में अथवा गूढ़ [ मरे हुए ] गर्भ के निकालने में यदि किसी से गौ मरजाय तो वह पाप का भागी नहीं होता ॥ १३९ ॥