अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२० भाषाथंसहिता ॥
समालिङ्गेत्स्त्रियंवापि दीप्तांकाष्णायसींऋताम् । चान्द्रायणानिकुर्याच्च चत्वारित्रीणिवाद्विजः ॥१२७॥ मुच्यतेचततःपापात् प्रायश्चित्तेकृतेसति । एभिःसम्पर्कमायाति यःकश्चित्पापमोहितः ॥१२८॥ तत्तत्पापविशुद्ध्यर्थं तस्यतस्यव्रतंचरेत् । क्षत्रियस्यवधंकृत्वा त्रिभिःकृच्छ्रैर्विशुद्ध्यति ॥१२९॥ कुर्याच्चैवानुरूपेण त्रीणिकृच्छ्राणिसंयतः । वैश्यहत्यान्तुसंप्राप्तः कथंचित्काममोहितः ॥१३०॥ कृच्छ्रातिकृच्छ्रौकुर्वीत पनरौवैश्यघातकः । कुर्याच्छूद्रवधेविप्र-स्तप्तकृच्छ्रंयथाविधि ॥१३१॥ एवंशुद्धिमवाप्नोति संवर्त्तवचनंयथा । गोघ्नस्यातःप्रवक्ष्यामि निष्कृतिंतत्त्वतःशुभाम् ॥१३२॥
अथवालोहे की स्त्री बना कर और उसे लाल तपा कर लिपट कर के मरे अथवा द्विज चार वा तीन चान्द्रायण व्रत करे ॥१२७॥ पुनः प्रायश्चित्त करने के अनन्तर उस पापसे मुक्त होता है। जो कोई पाप से मोहित पुरुष इनसे सम्बन्ध करता है ॥१२८॥ वह भी उस पाप की शुद्धि के लिये उसी २ पाप का प्रायश्चित्त करे—क्षत्रिय को मार कर ब्राह्मण तीन कृच्छ्रों से सम्यक् प्रकार शुद्ध होता है ॥१२९॥ यथोचित तीन कृच्छ्र सावधान होकर करे । जो काम से मोहित मनुष्य कदाचित् वैश्य की हत्या करे॥१३०॥तो वैश्य का घातक वह मनुष्य कृच्छ्र और अतिकृच्छ्र व्रत करे और शूद्र के मारने में ब्राह्मण विधि से तप्तकृच्छ्र व्रत करे ॥१३१॥ संवर्त्त के वचनानुसार इस प्रकार शुद्धि को प्राप्त होता है अब गोहिंसा करने वाले का यथार्थ उत्तम प्रायश्चित्त कहते हैं ॥१३२॥ गौ को जो मारे वह गौशाला में और गौ के समीप अपना संस्कार करे और गौशाला में ही इन्द्रियों को वश में रख कर पन्द्रह दिन तक पृथिवी पर सोवे ॥ १३३ ॥