अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंवर्त्तस्मृतिः ॥ १८
गोमूत्रमग्निवर्णंवा गोमयंवातथाविधम् ॥ १२० ॥ घृतंवात्रीणिपेयानि सुरापोव्रतमाचरेत् । मुच्यतेतेनपापेन प्रायश्चित्तेकृतेसति ॥ १२१ ॥ अरण्येवावसेत्सम्यक् सर्वकामविवर्जितः । चांद्रायणानिवात्रीणि सुरापोव्रतमादिशेत् ॥ १२२ ॥ एवंशुद्धिःसुरापस्य भवेदितिनसंशयः । मद्यभांडोदकंपीत्वा पुनःसंस्कारमर्हति ॥ १२३ ॥ स्तेयंकृत्वासुवर्णस्य स्तेयंराज्ञेनिवेदयेत् । ततोमुशलमादाय स्तेनंहन्यात्सकृन्नृपः ॥ १२४ ॥ यदिजीवतिसस्तेन-स्ततःस्तेयाद्विमुच्यते । अरण्येचीरवासावा चरेद्ब्रह्महणोव्रतम् ॥ १२५ ॥ एवंशुद्धिःकृतास्तेये संवर्तवचनंयथा । गुरुतल्पेशयानस्तु तप्तेस्वप्यादयोमये ॥१२६॥
वा अथवा अग्नि से तपाये गोमूत्र वा गोबर को पीवे ॥ १२० ॥ अथवा तपा घी ये गोमूत्रादि तीन ही पीने योग्य हैं अर्थात् तपायी हुई मदिरा पीना अच्छा नहीं । गोमूत्रादि किसी को पीकर मर जावे मद्य पीने वाला इस व्रत को करे इस प्रायश्चित्त के कर लेने पर मद्यपान के पाप से छूट जाता है ॥ १२१ ॥ अथवा सम्यक् प्रकार सर्वकामनाओं को छोड़ कर वन में बसे यद्वा मदिरा पीने वाला तीन चांद्रायण प्रायश्चित्त करे ॥ १२२ ॥ इस प्रकार मदिरा पीने वाले की शुद्धि होती है इस में संदेह नहीं है । मदिरा के पात्र का जल पीकर फिर उपनयन संस्कार के योग्य होता है ॥१२३॥ सोने की चोरी करके उस चोरी का अपराध राजा से निवेदन कर तब राजा मूशल लेकर एक बार उस चोर के मार दे ॥ १२४ ॥ यदि वह चोर जीवित हो जावे तो चोरी के पाप से मुक्त हो जाता है अथवा वन में जाकर पड़े हुये फटे वस्त्र पहन कर ब्रह्महत्या का व्रत करे ॥ १२५ ॥ संवर्तऋषि के वचनानुसार इस प्रकार सुवर्ण चोरी की शुद्धि विहित है गुरु की शय्या पर गमन करके तपाये हुए लोहे के पात्र [कड़ाही] में शयन करके शरीर को छोड़े ॥ १२६ ॥