अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 223, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ ॥ पाराशर्यसंहिता ॥
वन्यान्येवफला-न्यश्नन् सर्वकामविवर्जितः ।
भिक्षार्थीविचरेद्ग्रामं वन्यैर्यदिनजीवति ॥ ११४ ॥
चातुर्वर्ण्यञ्चरेद्भैक्ष्यं खट्वांगीसंयतःसदा ।
भिक्षास्त्वेवंसमादाय वनंगच्छेत्ततःपुनः ॥ ११५ ॥
वनवासीसपापःस्या-त्सदाकालमतंद्रितः ।
ख्यापयन्मुच्यतेपापा-द्ब्रह्महापापकृत्तमः ॥ ११६ ॥
अनेनतुविधानेन द्वादशाब्दव्रतंचरेत् ।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वभूतहितेरतः ॥ ११७ ॥
ब्रह्महत्यापनीदाय ततोमुच्येतकिल्विषान् ।
अतःपरंसुरापस्य निष्कृतिंश्रोतुमर्हथ ॥ ११८ ॥
गौड़ीमाध्वीचपैष्टीच विज्ञेयात्रिविधासुरा ।
यथैवैकातथासर्वा नपातव्याद्विजोत्तमैः ॥ ११९ ॥
सुरापस्तुसुरांतप्तां पिबेत्तन्पापमोक्षकः ।
संपूर्ण कामों को त्याग कर वन के ही फल मूल खावे यदि उनसे जीवन का निर्वाह न हो तो भिक्षा के अर्थ गांव में भ्रमण करे ॥ चारों वर्णों से भिक्षा मांगे तथा हत्या के चिन्ह को बांधे रहे और मन को सदा वश में रक्खे इस प्रकार भिक्षा लेकर फिर वन में चला जाय ॥ ११५ ॥ यह पापी ( हत्यारा ) आलस्य को छोड़ कर सदा वन में ही वास करे बड़ा भी पापी अपने पाप को प्रसिद्ध करता हुआ पाप से छूटता है ॥ ११६ ॥ इस रीति से बारह वर्ष का व्रत करे और सब इन्द्रियों को रोक कर सब भूतों के हित में तत्पर रहे ॥ ११७ ॥ ब्रह्महत्या के दूर करने के लिये पूर्वोक्त आचरण करे पुनः पाप से मुक्त होता है । अब मदिरा पीने वाले का प्रायश्चित्त सुनो ॥ ११८ ॥ गौड़ी (गुड़ की) माध्वी [महुवा की] पैष्टी (पिसी दवा या चून आदि की) यह तीन प्रकार की मदिरा होती है इनमें जैसी एक वैसी ही सब हैं इस से ब्राह्मणादि उत्तम द्विज मदिरा को कदापि न पीवें ॥ ११९ ॥ मदिरा पीने वाला ब्राह्मण उस के पीने के पाप से छूटा चाहे तो तपाई हुई मदि-