भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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संवर्त्तस्मृतिः ॥ १७

अष्टौभिक्षाःसमादाय समुनिःसप्तपंचवा ॥१०७ ॥
अद्भिःप्रक्षाल्यताःसर्वा भुंजीतसुसमाहितः ।
अरण्येनिर्जनेतत्र पुनरासीतमुक्तवान् ॥ १०८ ॥
एकाकीचिंतयेन्नित्यं मनोवाक्कायकर्मभिः ।
मृत्युंचनाभिनंदेत जीवितंवाकथंचन ॥ १०९ ॥
कालमेवप्रतीक्षेत यावदायुः समाप्यते ।
संसव्यचाश्रमान्सर्वान् जितक्रोधोजितेंद्रियः ॥११०॥
ब्रह्मलोकमवाप्नोति वेदशास्त्रार्थविद्विजः ।
आश्रमेषुचसर्वेषु प्रोक्तोयं प्राश्निकोविधिः ॥१११ ॥
अतःपरं प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तविधिंशुभम् ।
ब्रह्मघ्नश्चसुरापश्च स्तेयीचगुरुतल्पगः ॥ ११२ ॥
महापातकिनस्त्वेते तत्संयोगीचपंचमः ।
ब्रह्मघ्नश्चवनंगच्छे द्वल्कवासाजटीध्वजी ॥११३॥


त्मविद्या में तत्पर और विचारवान् हो वह सन्यासी आठ वा सात वा पांच घरसेभिक्षा ग्रहण करके ॥ १०७ ॥ उन सब भिक्षाओं को जल से धोकर सावधानी से भोजन करे और फिर जहां कोई जन न हो ऐसे वन में मुक्ति का अभिलाषी संन्यासी बैठे ॥ १०८ ॥ मन वाणी देह और कर्म से एकाकी नित्य ब्रह्म का विचार करे मरने और जीने को कभी भी प्रशंसा न करे ॥ १०९॥ इस प्रकार जब तक अवस्था समाप्त हो काल की प्रतीक्षा करे क्रोध और इन्द्रियों को जीतकर चारों आश्रमों का सेवन करके ॥ ११० ॥वेद और शास्त्र के अर्थ का जानने वाला ब्राह्मण ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है— यह चारों आश्रमों के प्रश्न [ जो तुमने पूछा था ] की विधि कही ॥ १११ ॥ इससे आगे प्रायश्चित्त के उत्तम विधान को कहते हैं ब्रह्महत्यारा मदिरा पीने वाला और गुरू की शय्या पर गमन करने वाला ॥ ११२ ॥ ये चारों और पांचवां इनका संगी महापातकी होते हैं ब्रह्महत्यारा वन में चला जाय और वल्कल जटा तथा शिरकटे पुरुष की तस्वीर ध्वजा में कपोड़ी इन को रक्खे ॥ ११३॥